प्रेमचंद पूर्व उपन्यास एवम् प्रेमचंद के उपन्यास( सारी जानकारी केवल 10 मिनट में)

प्रेमचंद पूर्व उपन्यास एवम् प्रेमचंद के उपन्यास( सारी जानकारी केवल 10 मिनट में)

प्रेमचंद पूर्व उपन्यास एवम् प्रेमचंद के उपन्यास( सारी जानकारी केवल 10 मिनट में)    • प्रेमचंद पूर्व उपन्यास एवम् प्रेमचंद के उप...   प्रेमचंद पूर्व हिंदी उपन्यास - प्रेमचंद पूर्व हिंदी उपन्यास का समय सन 1882 परीक्षा गुरु के प्रकाशन से 1918 सेवा सदन के प्रकाशन तक माना जाता है । इस युग के उपन्यासों में दो प्रवृत्तियां प्रधान थी - मनोरंजन एवं उपदेश। इस युग के उपन्यासों को पांच भागों में बांटा जा सकता है - तिलिस्मी उपन्यास - इन उपन्यासों के जनक देवकीनंदन खत्री जी माने जाते हैं। खत्री जी का संबंध जंगली लकड़ियों के व्यवसाय से था। बीहड़ जंगलों से जुड़े होने के कारण उनके लिए , इस प्रकार के उपन्यास लिखना सरल था। उन्होंने चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति, भूतनाथ ,काजर की कोठरी आदि अनेक उपन्यास लिखे। उनके उपन्यासों को पढ़ने के लिए अनेक उर्दू भाषी लोगों ने हिंदी सीखी। जासूसी उपन्यास- गोपाल राम गहमरी जी इस प्रकार के उपन्यासों के जनक माने जाते हैं । वह अंग्रेजी के आर्थर कानन डायल से प्रभावित थे। अद्भुत लाश, सरकटी लाश( 19 सौ ),जासूस की भूल(,1901), जासूस पर जासूसी (1904 ) आदि उनके प्रसिद्ध उपन्यास है। उन्होंने अनेक जासूसी उपन्यास लिखें। ऐतिहासिक उपन्यास- ऐतिहासिक उपन्यासकारों में किशोरी लाल गोस्वामी जी का नाम प्रमुख है। इनके अतिरिक्त हजारी प्रसाद द्विवेदी एवम् दीनबंधु जी की विशेष भूमिका रही। सामाजिक उपन्यास - सामाजिक उपन्यास नैतिकता एवं उद्देश्यपरकता प्रधान थे । इनमें लज्जाराम शर्मा ,अयोध्या प्रसाद खत्री एवं ठाकुर जगमोहन सिंह का नाम लिया जा सकता है। अनुदित उपन्यास - अनुदित उपन्यासों में गदाधर सिंह के दुर्गेश नंदिनी एवं बंग विजेता और राधा कृष्ण दास के स्वर्ण लता इन सबके अतिरिक्त प्रताप नारायण मिश्र जी के राधा रानी एवं राज सिंह आदि बंगला से अनूदित उपन्यासों में प्रमुख थे। परीक्षा गुरु उपन्यास - यह उपन्यास अट्ठारह सौ बयासी में प्रकाशित श्रीनिवास दास जी द्वारा रचित है। इसमें दिल्ली के एक सेठ मदन मोहन की कथा है, जो पाश्चात्य सभ्यता की चकाचौंध से प्रभावित होकर गलत संगति में पड़ जाता है । अंत में ब्रजकिशोर उसे धीरे-धीरे सुधारता है। श्रीनिवास दास जी ने अपनी इस रचना को, अनुभव द्वारा उपदेश मिलने की सांसारिक वार्ता कहा है। प्रेमचंद के उपन्यास - 1918 से सेवा सदन के प्रकाशन से 1936 गोदान के प्रकाशन तक का यह समय बहुत ही प्रसिद्ध है । प्रेमचंद के उपन्यासों की दो प्रवृतियां स्पष्ट है - सामाजिक यथार्थवाद एवम् सामाजिक उपदेशबाद । आरंभिक उपन्यासों में - समस्या का समाधान समझाने का उन्होंने प्रयास किया। आदर्शवाद , सदनवादी सोच , ह्रदय परिवर्तन आश्रमवादी नैतिकता, समाधान की पड़ताल आदि उनके आरंभिक उपन्यासों में रही। किंतु धीरे-धीरे उनकी लेखनी यथार्थवादीता की ओर चल पड़ी। आखिरी पड़ाव में - लेखन शैली पूर्णतया परिवर्तित हो गई। आदर्शात्मक समाधान की अपेक्षा समस्या का यथार्थ चित्रण या कहा जाए तो हुबहू वर्णन उन्होंने किया। मजदूरों की त्रासदी, शोषण , कृषक जीवन की यंत्रणा, विधवा जीवन के कष्ट , कृषि , ग्रामीण गरीबी ,आदि को बिना किसी आदर्श का जामा पहनाए , उन्होंने यथा तथ्य नग्न रूप में प्रस्तुत किया । उनके प्रकाशित उपन्यासों में देवस्थान रहस्य 1905 में प्रकाशित हुआ जो असरारे मुआविद उर्दू में प्रकाशित उपन्यास का हिंदी रूपांतर था। प्रेमा - 1907 में प्रकाशित हुआ, जो उर्दू के 1906 में प्रकाशित हम खुर्मा हम स्वाद का हिंदी रूपांतर था । इसमें विधवा जीवन की समस्या का वर्णन है। सेवा सदन 1918 में प्रकाशित हुआ। यह भी उर्दू के बाजार ए हुस्न का हिंदी रूपांतर था। इसमें वेश्या जीवन के विषय में बताया है । 1921 में प्रकाशित वरदान, उर्दू के जलवाए इसार का हिंदी रूपांतर था। प्रेमाश्रम 1922 में प्रकाशित हुआ, जो गोशाए आफियत से हिंदी में रूपांतरित था। रंगभूमि 1925 में प्रकाशित हुआ, जो उर्दू के चौगाने हस्ती का हिंदी रूपांतर था। कायाकल्प 1926 में प्रकाशित हुआ। इसमें पुनर्जन्म की धारणा पर समाज सेवा एवं सच्चे प्रेम का चित्रण है। निर्मला 1927 में प्रकाशित हुआ। दहेज एवं अनमोल विवाह के साथ किशोर मन की भावना एवं अधेड़ में की भोग लिप्सा का वर्णन है । गबन 1931 में प्रकाशित हुआ, जिसमें आभूषण प्रेम और उसके कारण होने वाली समस्याएं के साथ जीवन की असंगति का भी मनोवैज्ञानिक चित्रण है । कर्मभूमि ,1933 में प्रकाशित है। इसमें हिंदू मुस्लिम एकता, स्वतंत्रता संग्राम एवं दलित किसानों की व्यथा का वर्णन है। गोदान 1936 में प्रकाशित है।यह किसान जीवन की महागाथा है एवम् ऋण की समस्या को दिखाया गया है। मंगलसूत्र ,1948 में प्रकाशित एक अधूरा उपन्यास था। हजारी प्रसाद द्विवेदी जी प्रेमचंद के विषय में लिखते हैं, " प्रेमचंद शताब्दियों से पददलित और उपेक्षित कृषकों की आवाज थे। अगर आप उत्तर भारत की समस्त जनता के आचार - विचार, भाषा - भाव ,रहन-सहन ,आशा आकांक्षा , दुख - सुख और सूझ बूझ को जानना चाहते हैं, तो प्रेमचंद से उत्तम परिचायक आपको नहीं मिल सकता।"