Gita Adh 03|Slok 3.34-3.39 कामना समस्त पापों की जड़, वर्णाश्रम पालन से नष्ट,कर्म रागद्वेष पूर्वक नहीं

Gita Adh 03|Slok 3.34-3.39 कामना समस्त पापों की जड़, वर्णाश्रम पालन से नष्ट,कर्म रागद्वेष पूर्वक नहीं

भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि हमारी प्रत्येक इंद्रियों के विषयों में राग और द्वेष नामक शत्रु छुपे हुए हैं जो कि हमारी आध्यात्मिक प्रगति में बाधक है। यह राग और द्वेष है क्या? जो विषय या परिस्थिति हमारे मन को अनुकूल लगती है उसके प्रति हमारे मन में राग हो जाता है और जो प्रतिकूल लगती है उसके प्रति द्वेष लेकिन हमें इस बात को बहुत अच्छे से समझना होगा कि राग और देश का कारण वस्तुतः कोई पदार्थ व्यक्ति परिस्थिति नहीं है अपितु हमारा मन ही है क्योंकि एक ही पदार्थ या व्यक्ति या परिस्थिति किसी के लिए तो अनुकूल होती है और किसी के लिए प्रतिकूल। अर्थात राग और द्वेष वस्तु और व्यक्ति में नहीं होकर हमारे मन में है। जैसे दक्षिण अफ्रीका की रहने वाली कोई विश्व सुंदरी पर हो सकता है कि यूरोप के लाखों-करोड़ों लोग मरते हो लेकिन भारत का कोई सामान्य सा व्यक्ति भी शायद उससे विवाह नहीं करना चाहे, अर्थात सुंदरता के मानक सब जगह अलग-अलग हैं। ऐसे ही वर्षा होती है किसी को प्रिय होती है किसी को अप्रियल। ऐसे ही पदार्थों को लेकर भी है कोई विशेष सब्जी हमें बहुत प्रिय होती है कोई अप्रिय । श्री कृष्ण साररूप में यही बात कहते हैं कि हमारी दृष्टि परिणाम पर रहे न कि वस्तु व्यक्ति और परिस्थिति पर। जैसे कि कांटा निकलवाते समय या पैर का ऑपरेशन कराते समय कष्ट का अनुभव होते हुए भी हमारे मन में दुख नहीं होता अपितु प्रसन्नता होती है क्योंकि हमें पता है परिणाम अच्छा रहने वाला है। इसी तरह मनुष्य जीवन भगवत कृपा से मिला है इसमें अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थिति की परवाह ना करते हुए और अपने लक्ष्य पर दृष्टि कायम रखें तो कल्याण सहज है। भगवान स्वधर्म पालन पर विशेष जोर देते हैं और समस्त पापों की जड़ कामना को बताते हैं अर्थात कामना ही हमसे गलत आचरण कराती है। कामना में बाधा लगने पर क्रोध होता है इस कामना को मारने का उपाय भी भगवान आगे के श्लोकों में स्पष्ट रूप से बताएंगे । लेकिन कामना का असली कारण राग और द्वेष है अतः हम राग और द्वेष के वश में नहीं हो। समता में रहने का अभ्यास करें। अपने जीवन का उद्देशय पहचान कर उसे दृढ़ करते रहें। हरे कृष्ण