भगवान श्री कृष्ण तीसरे अध्याय जिसका कि नाम कर्म योग है उसमें कर्मों को करने की शैली एवं आचरण की बात बता रहे हैं । कर्म योग से सिद्ध हुए महापुरुष के लिए वस्तुतः कोई कर्म करना बाकी नहीं रहता अर्थात वह अपने स्वार्थ के लिए किसी भी कर्म में रत नहीं होता उसके समस्त कर्म लोक-संग्रह अथवा लोक-कल्याण के लिए ही होते हैं। वह समस्त प्राणियों के हित में ही कर्म करता है। हमें भी ऐसे ही आसक्ति से रहित होकर, प्रभु कृपा को अनुभव करके एवं सृष्टि चक्र के नियम का पालन करते हुए उसके अनुसार आभार रूप में ही कर्म करने चाहिए । यदि हम निष्काम भाव से कर्म करेंगे तो सृष्टि अपने आप हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति , बिना मांगे करती रहेगी। भगवान निष्काम कर्म योगी के रूप में राजा जनक का उदाहरण देते हैं ।राजा जनक समस्त भोग और ऐश्वर्य के बीच में रहते हुए भी वस्तुतः असंग ही हैं असंगता मन और बुद्धि के स्तर पर होती है। राजा जनक भोग विलास में रात दिन लगे हुए प्रतीत होने के बावजूद भी निष्काम कर्म योगी हैं भगवान श्री कृष्ण अपना उदाहरण देते हुए कहते हैं कि मैं भी लोक-शिक्षण के लिए लगातार कर्म में रत रहता हूं क्योंकि यदि मैं कर्म नहीं करूं तो मेरी देखा देखी संपूर्ण मानव जाति वर्ण शंकर होकर नष्ट हो जाए अर्थात कर्म नहीं करने में प्रवृत्त होकर नष्ट हो जाए, वर्णसंकर हो जाए। इसलिए भगवान श्री कृष्ण कुछ भी कामना रहते हुए भी सिर्फ लोक कल्याण के लिए लोक शिक्षण के लिए कर्म करते रहते हैं। महापुरुषों की प्रवृत्ति अर्थात कर्म में प्रवृत्त रहते समय निवृत्ति होती है अर्थात प्रवृत्ति में निवृत्ति और निवृत्ति में प्रवृत्ति। यही कर्मयोगका मूल मंत्र है। हरे कृष्णा