क्या आपने कभी सोचा है कि हमारी नींद धरती की गति से कैसे जुड़ी होती है? नींद सिर्फ एक शारीरिक ज़रूरत नहीं, बल्कि हमारे शरीर की एक जटिल प्रक्रिया है — और इसकी जड़ें हमारी धरती की घूर्णन गति से जुड़ी होती हैं। चलिए जानते हैं, कैसे अंतरिक्ष में जाकर वैज्ञानिकों की नींद गड़बड़ा जाती है और इसका क्या कारण होता है। सर्केडियन रिद्म क्या है? हमारे शरीर में एक आंतरिक घड़ी होती है, जिसे सर्केडियन रिद्म (Circadian Rhythm) कहते हैं। यह 24 घंटे के एक चक्र में काम करती है और यह चक्र प्राकृतिक दिन-रात के बदलावों पर आधारित होता है। जैसे ही सूरज उगता है, शरीर को जगने का संकेत मिलता है और जैसे ही अंधेरा होता है, नींद के हार्मोन (मेलाटोनिन) सक्रिय हो जाते हैं। अंतरिक्ष में क्या होता है? अंतरिक्ष में धरती जैसा "दिन" और "रात" नहीं होता। वहां सूरज एक ही दिशा में लगातार चमक सकता है, या फिर लंबे समय तक अंधेरा बना रह सकता है — खासकर अंतरिक्ष यान या अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) में। उदाहरण के लिए, अंतरिक्ष स्टेशन हर 90 मिनट में धरती का एक चक्कर लगाता है, यानी हर 45 मिनट में दिन और रात बदलते हैं! इसका सीधा असर अंतरिक्ष यात्रियों की सर्केडियन रिद्म पर पड़ता है, जिससे उन्हें नींद नहीं आती, या नींद का समय गड़बड़ा जाता है। इस समस्या का हल कैसे खोजा गया? वैज्ञानिकों ने इस समस्या का समाधान निकालने के लिए कई तरीके अपनाए हैं: कृत्रिम रोशनी (Artificial Lighting): अंतरिक्ष स्टेशन में विशेष तरह की रोशनी लगाई जाती है जो धरती पर दिन और रात जैसा अहसास देती है। नियमित शेड्यूल: अंतरिक्ष यात्री एक निर्धारित रूटीन के अनुसार सोते-जागते हैं, जिससे शरीर को एक नया पैटर्न अपनाने में मदद मिलती है। नींद के लिए दवाइयाँ: कुछ मामलों में नींद की गुणवत्ता बेहतर बनाने के लिए मेलाटोनिन जैसी दवाइयाँ भी दी जाती हैं। हमारी नींद सिर्फ थकावट मिटाने का जरिया नहीं, बल्कि धरती के चक्र के साथ तालमेल का नतीजा है। अंतरिक्ष में "दिन-रात" की गैरमौजूदगी इस तालमेल को तोड़ देती है, जिससे वैज्ञानिकों को नींद की समस्याएं होती हैं। लेकिन वैज्ञानिकों ने इस चुनौती का सामना तकनीक और अनुसंधान से किया है — ताकि अंतरिक्ष में भी वे स्वस्थ और सतर्क रह सकें।