अकबर और बीरबल की कहानी, hindi kahaniya, kahani majedar, Moral story, funny story, kahani yo ka desh

अकबर और बीरबल की कहानी, hindi kahaniya, kahani majedar, Moral story, funny story, kahani yo ka desh

अकबर और बीरबल की कहानी, hindi kahaniya, kahani majedar, Moral story, funny story, kahani yo ka desh अकबर और बीरबल की मज़ेदार कहानी अकबर और बीरबल की कहानियाँ हमेशा से ही लोगों को हँसी, बुद्धि और चतुराई का अनोखा संगम देती आई हैं। बीरबल की बुद्धिमत्ता तो मशहूर थी ही, लेकिन उनके हाज़िरजवाबी और चुटीले जवाब बादशाह अकबर तक को हँसा देते थे। यहाँ एक लंबी, मज़ेदार कहानी है जो कई छोटे-छोटे प्रसंगों को जोड़कर आपको 1500 शब्दों में हँसी और मज़ा देगी। --- पहला प्रसंग – तोते की गवाही एक दिन दरबार में एक किसान शिकायत लेकर आया। किसान बोला – “जहाँपनाह! मेरा तोता बहुत ही अनमोल है। वह न सिर्फ बातें करता है बल्कि लोगों के राज़ भी खोल देता है। कल रात मेरे पड़ोसी ने उसे चुरा लिया और अब कहता है कि यह उसका तोता है।” अकबर ने गम्भीर होकर पूछा – “तोते से पूछ लो, वही सच बता देगा।” सारे दरबारी हँसने लगे। अकबर ने आदेश दिया कि तोता दरबार में लाया जाए। तोता पिंजरे में लाया गया और अकबर ने पूछा – “बताओ, तुम किसके हो?” तोता बोला – “मैं तो भूखा हूँ… कोई दाना दो।” दरबारियों की हँसी छूट गई। अब अकबर झेंप गए और बोले – “बीरबल! अब इसका फैसला तुम करो।” बीरबल मुस्कुराए और बोले – “जहाँपनाह, असली मालिक का नाम लेने पर तोता तुरंत प्रतिक्रिया देगा।” उन्होंने किसान से कहा – “तुम अपना नाम जोर से लो।” किसान बोला – “मेरा नाम गंगाराम है।” तोते ने तुरंत कहा – “गंगाराम… गंगाराम… दाना दो!” सारा दरबार ठहाकों से गूंज उठा। अकबर हँसते हुए बोले – “सचमुच बीरबल, तुम्हारे दिमाग की बराबरी कोई नहीं कर सकता।” --- दूसरा प्रसंग – खिचड़ी पक गई या नहीं? सर्दियों के दिन थे। अकबर दरबार में बोले – “जो कोई भी सारी रात यमुना के किनारे बिना आग जलाए खड़ा रहकर ठंडी सह लेगा, उसे मैं 1000 स्वर्ण मुद्राएँ दूँगा।” कई लोगों ने हार मान ली। पर एक गरीब ब्राह्मण ने हिम्मत दिखाई और पूरी रात नदी के किनारे खड़ा रहा। सुबह दरबार में उसे लाया गया। अकबर ने पूछा – “बताओ, तुमने रात कैसे काटी?” ब्राह्मण बोला – “जहाँपनाह, मैंने दूर किले पर जलती आग की लौ देखी और उसी की कल्पना से गर्मी पाई।” अकबर ने तुरंत कहा – “तो तुमने आग का सहारा लिया। इनाम नहीं मिलेगा।” बेचारा ब्राह्मण उदास हो गया। अब बीरबल को यह नाइंसाफी बर्दाश्त नहीं हुई। कुछ दिन बाद बीरबल ने अकबर को खाने पर बुलाया। अकबर पहुँचे तो देखा, बीरबल ने एक बहुत ऊँचे बांस पर हांडी टाँग रखी थी और नीचे एक दीया जल रहा था। अकबर बोले – “ये कैसी खिचड़ी पका रहे हो? दीये की लौ इतनी दूर है, इससे कैसे पकेगी?” बीरबल ने मुस्कुराते हुए कहा – “जहाँपनाह, जिस तरह ब्राह्मण दूर की आग से गर्मी पा सकता है, वैसे ही मेरी खिचड़ी भी इस दीये से पक जाएगी।” अकबर को तुरंत अपनी गलती समझ आ गई और उन्होंने ब्राह्मण को 1000 स्वर्ण मुद्राएँ देकर माफी माँगी।