ये कहानी उस मजदूर के मजबूरी की है जिसे वक्त ने ऐसा बेबस कर दिया कि जब तीन दिन की पैदल यात्रा के बाद हाथों से निवाले को छुआ तो आंखों ने पहले जवाब दे दिया… खाना गले से इस गरीब के उतर नहीं रहा था… पहले तो आंखों को रोटी की शक्ल देखनी थी..हाथों को छूकर देखना था कि कोई शाम का स्वप्न तो नहीं… लेकिन जब हाथों ने खाने को छुआ तो आंखों से ऐसी गंगा बह निकली जिसकी धार हमारे और आपके कलेजे को काट कर रख दे… कलेजा थाम लीजिए… और आंखों को बहने दीजिए.. ये बेबसी के आंसूं हैं.. ये भूखमरी के आंसूं हैं… ये एक गरीब के आंखों से निकला आंसू है… जो हमें और आपको ये सोचने पर मजबूर कर रहा है कि त्रासदी ना जात देखती ना दीन देखती है और ना अमीर गरीब देखती है.. अमीरों का क्या उन्होंने तो घर भर लिया है लेकिन इन गरीबों को रास्ते पर चलने के लिए छोड़ दिया.. घबराइए मत बस ये सोचिए कि अगर इन गरीबों की खुद्दारी जाग गई तो क्या पता हर अमीर ही गरीब ना बन जाए… बात समझ नहीं आई तो एक बार पूरा वीडियो दिखा देते हैं… India News