नई टिहरी। पंवाली कांठा टिहरी जिले में स्थित उत्तराखण्ड का सबसे बड़ा बुग्याल एवं सर्वश्रेष्ठ ट्रेक में एक है, जिसमें विभिन्न प्रकार के आकर्षक फूल, जड़ी बूटी बहुतायत में पाई जाती हैं। अप्रैल और मई के महीने में यह स्थान लाल, गुलाबी, पीले आदि फूलों के गुच्छों और घास की हरियाल से सदाबहार रहता है। पंवाली कांठा जाने के लिये पर्यटकों को घुत्तु घनसाली से 18 किमी0 की कठीन चढ़ाई पैदल करनी पड़ती है। आपको बता दें यह ट्रेक गंगोत्री से केदारनाथ के प्राचीन धार्मिक मार्ग पर पड़ता है। ट्रेकर्स यहाँ बसे दूरस्थ गाँवों से गुजरते हैं। जहाँ वे वास्तविक गढ़वाल के जीवन को देख पाते हैं। ट्रेक में जगह-जगह चरवाहे दिखाई देते हैं जो शिवालिक रेंज और हिमालय के बीच निवास करते हैं। पंवाली कांठा में पर्यटक चरवाहे के यहां दूध, दही, मठा, घी आदि पहाड़ी एवं वास्तविक गढ़वाल जीवन का आन्नद ले सकते है। यहाँ से हिमालय पर्वतमाला के मनोरम दर्शनों के साथ-साथ यमुनोत्री गंगोत्री केदारनाथ बदरीनाथ पर्वत शिखरों के दर्शन भी होते हैं। हिमपात के समय बर्फ से ढकी थलय सागर, मेरु, कीर्ति स्तम्भ, चोखंभा, नीलकंठ आदि पहाड़ियों के मनोरम दृश्य को यहाँ से देखा जा सकता है। पर्यटकों के बीच पंवाली काँठा से सूर्यास्त देखने का एक विशेष आकर्षण रहता है। बारिश और साफ आसमान को देखते हुए शरद ऋतु पंवाली काँठा ट्रेक पर जाने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त समय है। इस समय हिमालय पर्वत और रंगीन जंगली फूलों से सजे हरे घास के बुग्याल जीवंत नजर आते हैं। प्राकृतिक परिदृश्यों एवं अपेक्षाकृत कम ऊंचाई होने के कारण यह एक सुखद ट्रेक साबित होता है। उत्तरी गढ़वाल हिमालय में स्थित पंवाली काँठा के घास के मैदान कई जंगली जानवरों का घर है। भाग्य साथ दे तो आप यहाँ भरल (नीली भेड़) घोर, हिमालयी भालू, दुर्लभ कस्तूरी मृग आदि को देख सकते हैं। उत्तराखण्ड टाइम्स का मुख्य उदे्दश्य उत्तराखण्ड की लोक संस्कृति, वेशभूषा, पहनावा, उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक विरासत, लोक गीत, लोक नृत्य, लोक कथाए एवं ताजा जानकारी के लिये कार्य करना है panwali kantha, Panwali Kantha Bugyal, bugyal, बुग्याल, Trekking, best trekkinplace,