बजरंग बाण | पाठ करै बजरंग बाण की हनुमत रक्षा करै प्राण की | जय श्री हनुमान | तिलक प्रस्तुति 🙏 Watch the video song of ''Darshan Do Bhagwaan'' here - • दर्शन दो भगवान | Darshan Do Bhagwaan | Sur... Ramanand Sagar's Shree Krishna Episode 36 - Shri Krishna gave the vision to Akrur in its true form श्रीकृष्ण बलराम संग मथुरा को प्रस्थान करते हैं किन्तु गोपिकाऐं उनके रथ के आगे लेटकर उनका मार्ग रोक लेती हैं। वे श्रीकृष्ण के लाख समझाने पर भी नहीं मानती हैं। तब कृष्ण उन्हें प्रेम का वास्तविक अर्थ समझाते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे जिस तरह मार्ग में लेटकर प्रदर्शन कर रही हैं, वह प्रेम नहीं, मोह है। कृष्ण गोपिकाओं से कहते हैं कि वह उन्हें कर्तव्य पथ पर जाने से रोककर अपने प्रेम की विजय मान रही हैं तो वे प्रेम का अर्थ ही नहीं जानती हैं। और यदि उन्हें प्रेम का अर्थ नहीं पता है तो वे प्रेम क्या करेंगी। वे एक एक गोपिका को अपने हाथ का सहारा देकर उठाते हैं, अपने हाथों से उनके अश्रु पोंछते हैं। कृष्ण गोपिकाओं से कहते हैं कि सच्चा प्रेम प्रेमी को कर्तव्य पथ पर जाने से नहीं रोकता है। वह तो उनके निश्चल प्रेम को अपने हृदय में भरकर मथुरा के महलों में यह सोचकर ले जा रहे थे कि जब राजनीति के मिथ्या वातावरण में उनका जी घबड़ायेगा, वह अपने हृदय में झाँक कर उन सबके निस्वार्थ और निश्चल प्रेम की झाँकी को देखकर अपना मन शीतल कर लिया करेंगे जिससे जीवन की सुन्दरता के प्रति उनका विश्वास हर पल दृढ़ होता रहे। कृष्ण क्षोभ व्यक्त करते हैं कि उन्होंने उन गोपिकाओं से प्रेम किया जो प्रेम का अर्थ भी नहीं जानते हैं। ललिता निरूत्तर होती है। वह कृष्ण से कहती है कि उन्होंने उन्हें न तो जीवित छोड़ा है और न ही मरने की दशा में छोड़ा है। वह कृष्ण से जाने से पूर्व एक वचन माँगती है कि उन्हें जीवन में पुनः उनके शीतल चरणों की छाया प्राप्त हो। कृष्ण उससे एक बार पुनः आने का वचन देते हैं। इसके बाद कृष्ण गोपिकाओं से विदा लेते हैं और रथ में जुते घोड़ों की रास अपने हाथ में थामकर गोपिकाओं के बीच से रथ निकाल ले जाते हैं। राधा पहाड़ी पर चढ़कर जाते हुए कृष्ण को अन्तिम क्षण तक देखती हैं और अश्रुपूरित नेत्रों से विदाई गीत गाती हैं। रास्ते में अक्रूर के विश्वस्त सैनिक भी रथ के साथ हो लेते हैं। कृष्ण के पूछने पर अक्रूर बताते हैं कि उन्हें आशंका है कि रास्ते में कंस के सैनिक हमला कर उनकी हत्या कर सकते हैं इसलिये उन्होंने तीन दस्तों का गठन किया है। एक दस्ता साथ चल रहा है और दूसरा यमुना किनारे तैनात है जहा से उन्हें नदी पार करनी है। तीसरा बलिदानी दस्ता है जो कंस के सैनिकों को धोखा देगा। कृष्ण पूछते हैं कि अगर कंस के सैनिकों ने अचानक हमला किया तो उसके लिये क्या प्रबन्ध किये गये हैं। अक्रूर बताते हैं कि पहाड़ी के दूसरी ओर कंस के सैनिक हैं। अतएव उन्होंने पहाड़ी पर कुछ गुप्तचर नियुक्त कर दिये हैं जो कंस के सैनिकों के आगे बढ़ते ही उन्हें संकेत भेज देंगे। कृष्ण अक्रूर के रणनीतिक कौशल की प्रशंसा करते हैं किन्तु यह भी कहते हैं कि वह अपने पिता वसुदेव का वचन झूठा नहीं होने देंगे और अक्रूर को उन्हें कंस के सुपुर्द कर देना चाहिये। इस पर अक्रूर कहते हैं कि यदि कृष्ण कंस के सम्मुख पेश किये गये तो उनकी प्राण रक्षा के लिये यादववीरों को अपना रक्त बहाना पड़ेगा और इस महासंग्राम के हजारों लाशें बिछ जायेंगी। श्रीकृष्ण अक्रूर को ढाँढस बधाते हैं और कहते हैं कि उन्हें कृष्ण बलराम की शक्ति पर भी भरोसा रखना चाहिये। रथ मथुरा की सीमा से पहले यमुना किनारे पहुँचता है। यमुना के दूसरी तरफ अक्रूर की दूसरी टुकड़ी तैनात है। उन्हें संकेत देने के लिये अक्रूर को यमुना के जल में चार डुबकियाँ लगानी हैं। संकेत की यह रणनीति पहले से निर्धारित की जा चुकी थी। अक्रूर की राजभक्ति देखकर बलराम कृष्ण से कहते हैं कि उन्हें अक्रूर को अपनी वास्तविकता से परिचित करा देना चाहिये अन्यथा वह उनकी सुरक्षा को लेकर चिन्तित होते रहेंगे। अक्रूर जब यमुना में डुबकी लगाते हैं तो उन्हें जल के भीतर कृष्ण और बलराम दिखायी पड़ते हैं। वह बाहर आकर देखते हैं तो वे दोनों उन्हें अपने रथ पर दिखायी पड़ते हैं। अक्रूर को हर डुबकी में बारम्बार वही दृश्य दिखता है। वह भ्रमित हो जाते हैं। अन्त में उनके भ्रम को दूर करने के लिये श्रीकृष्ण यमुना के जल के भीतर शेष शैया पर विराजमान होकर अपने साक्षात विष्णु स्वरूप में उन्हें दर्शन देते हैं। अक्रूर को सतयुग से द्वापर युग तक के समस्त विष्णु अवतारों के दर्शन भी होते हैं। इनमें मत्स्य अवतार, कूर्मावतार, वराह अवतार, नरसिंह अवतार, वामन अवतार, परशुराम अवतार, राम अवतार और वर्तमान के कृष्ण अवतार शामिल होते हैं। शेष नाग में उन्हें बलराम की छवि के दर्शन होते हैं। कृष्ण अक्रूर से कहते हैं कि मेरी सुरक्षा को लेकर आपके हृदय में मेरा निरन्तर वास बना रहा है। इसलिये वह उन्हें अपनी चिर भक्ति का वरदान प्रदान करते हैं। अक्रूर प्रभुकृपा से कृत होते हैं। वह हरि दर्शन से अभिभूत होकर यमुना से बाहर आते हैं। अक्रूर के सैनिक उनसे कहते हैं कि वे चौथी डुबकी लगाना भूल गये हैं। तब अक्रूर कहते हैं कि अब इसकी जरूरत नहीं रह गयी है। वह जान चुके हैं कि वह जिनकी सुरक्षा को लेकर चिन्तित थे, वो तो स्वयं तीनों लोकों के रक्षक हैं। अ्रकूर अपने सैनिकों को भी चिन्तामुक्त हो जाने को कहते हैं। अक्रूर रथ पर सवार कृष्ण के चरणों पर गिरकर उन्हें न पहचान पाने के लिये क्षमा माँगते हैं। उधर कंस अपने महल में बेचैनी से चहलकदमी कर रहा है। उसका मंत्री चाणुर कृष्ण और बलराम के गोकुल से निकल पड़ने की सूचना देता है। In association with Divo - our YouTube Partner #SriKrishna #SriKrishnaonYouTube