वर्ष का 21 वां रविवार योहन 6 : 60 से 69 अगस्त 22, 2021 आज के सुसमाचार में हम संत योहन रचित सुसमाचार , अध्याय 6 के अंतिम वाक्यांश को सुनते हैं, जिसमें पवित्र यूख्रीस्त अर्थात प्रभु येसु मसीह के शरीर एवं रक्त पर मनन किया गया है । सभी जनता एवं स्वयं शिष्य समझने में असमर्थ रहते हैं, किंतु मसीह यह भी भय नहीं रखते कि उनके शिष्य उनसे दूर हो जाएंगे। यह व्यतीत होता है कि मसीह के लिए यूखरिस्त किसी भी अन्य वस्तु से ज्यादा महत्व रखते थे - ""मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ-यदि तुम मानव पुत्र का मांस नहीं खाओगे और उसका रक्त नहीं पियोगे, तो तुम्हें जीवन प्राप्त नहीं होगा। जो मेरा मांस खाता और मेरा रक्त पीता है, उसे अनन्त जीवन प्राप्त है और मैं उसे अन्तिम दिन पुनर्जीवित कर दूँगा;" (योहन 6 : 53 - 54) बहुतों को लगता है कि ख्रीस्तीय जीवन जीना बहुत आसान है । जब हम अपने चारों ओर पाश्चात्य जीवन शैली एवं विकसित देशों को देखते हैं तो यह कल्पना करते हैं कि ईसाई धर्म अपनाना बहुत ही आसान है। जबकि पवित्र वचन हमें बताता है कि यह धर्म इस कथ्य से काफी भिन्न है। संत मत्ती 19: 21-24 में प्रभु येसु उस धनी युवक , जो उनसे अनंत जीवन पाने का आग्रह करता है, उसको समझाते हैं - "यदि तुम पूर्ण होना चाहते हो, तो जाओ, अपनी सारी सम्पत्ति बेच कर गरीबों को दे दो और स्वर्ग में तुम्हारे लिए पूँजी रखी रहेगी। तब आ कर मेरा अनु सरण करो। तब ईसा ने अपने शिष्यों से कहा, "मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ–धनी के लिए स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना कठिन होगा। मैं यह भी कहता हूँ कि सूई के नाके से हो कर ऊँट का निकलना अधिक सहज है, किन्तु धनी का ईश्वर के राज्य में प्रवेश करना कठिन है।" किन्तु जब शिष्य उनसे पूछते हैं - "तो फिर कौन बच सकता है?” उन्हें स्थिर दृष्टि से देखते हुए ईसा ने कहा, “मनुष्यों के लिए तो यह असम्भव है। ईश्वर के लिए सब कुछ सम्भव है।" जो लोग सांसारिक धन से विभूषित हैं उन्हें सांत्वना के शब्दों से दिलासा देना - निश्चय ही यह संदेश साफ है यदि हम सच में अनंत जीवन पाना चाहते हैं, हमें प्रभु येसु के पवित्र रोटी और दाखरस का सेवन करना है तथा अपने पद एवं वैभव को त्यागना है। आज के दूसरे पाठ में एफ़ेसियों को लिखते हुए अपने पत्र में संत पौलुस कहते हैं - " ईसाई - विवाह खलिसिया की दृष्टि में एक पुरुष एवं महिला एवं उनके स्थायी रिश्ते को उसी तरह परिभाषित करता है जिस प्रकार कलीसिया मसीह को। उन्हें यह जानकर आश्चर्य होगा। दु:ख की बात है कि जो परिवार समाज की आधारशिला है, वह हमारे स्वार्थी प्रेम , अराजक स्वतंत्रता एवं समर्पण की अनिच्छा से अस्थिर हो गया है। कुछ व्यक्तियों का भ्रम है कि गिरजाघर जाना एक मनोरंजन का कार्य है तथा यूख्रीस्त समारोह किसी भी सांस्कृतिक कार्यक्रम के जैसे है। बहुत से लोग जिन्होंने काथलिक कलीसिया की पूजन विधि में कभी भाग नहीं लिया, वे पवित्र यूख्रीस्त में विद्यमान मसीह की उपस्थिति से उसी प्रकार प्रभावित तथा मसीह की शिक्षा में विश्वस्त होते हैं, जिस प्रकार आज के सुसमाचार में वर्णित है। प्रभु येसु आज हम में से प्रत्येक से पूछते हैं - " क्या तुम मेरी शिक्षा को स्वीकार करते हो ? क्या तुम मेरे पवित्र भोज से तृप्त होना चाहते हो? क्या तुम वचनबद्ध होकर मेरे पीछे चलने को तैयार हो? " संत मत्ती 16: 24 कहता है - इसके बाद ईसा ने अपने शिष्यों से कहा, "जो मेरा अनुसरण करना चाहता है, वह आत्मत्याग करे और अपना क्रूस उठा कर मेरे पीछे हो ले: क्योंकि जो अपना जीवन सुरक्षित रखना चाहता है, वह उसे खो देगा और जो मेरे कारण अपना जीवन खो देता है, वह उसे सुरक्षित रखेगा।" येसु ख्रीस्त के साथ लाखों लोगों ने क्रूस उठाया एवं पवित्र यूख्रीस्त में विश्वास रखते हुए अपना जीवन समर्पित किया है। वेटिकन II में वर्णित शिक्षा हमें बताती है - "पवित्र यूख्रीस्त ख्रीस्तीय जीवन का स्त्रोत एवं शिखर है । यूख्रीस्त के अतिरिक्त मसीह ने किसी अन्य वस्तु अथवा व्यक्ति के विषय में इतनी गहराई से शिक्षा नहीं दी। इसी कारण काथलिक कलीसिया यूख्रीस्त को एक संस्कार अथवा समारोह की तरह मनाती है और उसके प्रत्येक सदस्य यह विश्वास करते हैं कि प्रभु मसीह , पवित्र यूख्रीस्त में साक्षात् विद्यमान हैं। संपूर्ण संसार में घटित पवित्र यूख्रीस्त के हजारों चमत्कारों के विवरण यह दर्शाते हैं कि पवित्र रोटी में प्रभु ख्रीस्त की जीवंत उपस्थिति निहित है । कार्लोस एक्यूटिस द्वारा बनाई गई यूख्रीस्तीय चमत्कारों की वेबसाइट के द्वारा प्रभु ख्रीस्त की जीवंत उपस्थिति का अनुभव करने के लिए हम सभी को समय निकालना चाहिए। सदियों से प्रभु येसु ने भी विश्वासियों के संदेह मिटाने के लिए दृष्टांतों का प्रयोग किया है। यहां तक की महान् वैज्ञानिकों ने स्वीकार किया है कि ख्रीस्त के दु:खभोग का स्मारक एक छोटा सा रोटी का टुकड़ा बिना किसी रसायनिक प्रक्रिया के , किस प्रकार मांस के टुकड़े में परिवर्तित हो जाता है। मुझे याद है कि किस प्रकार मेरी धर्मशिक्षिका मेरे 'प्रथम परम प्रसाद संस्कार' के लिए मुझे यूख्रीस्त का अर्थ समझाती थी उन्होंने हमें समझाया कि प्रभु येसु यूखरिस के रूप में हममें निवास करेंगे और हमें उन्हें अत्यंत आदर एवं निष्ठा से ग्रहण करना है। उन्होंने हमसे पूछा - "यदि आपके क्षेत्र का सबसे बड़ा व्यक्ति आपसे मिलने आए तो आप उसका किस तरह स्वागत करेंगे? कैसा व्यवहार करेंगे? कैसे कपड़े पहनेंगें ? क्या-क्या तैयारियां करेंगे और कितना आनंद मनाएंगे? हमें यूख्रीस्त में उपस्थित ख्रीस्त के लिए उससे भी अधिक आदर एवं आनंद से उत्सुक होना है। हम प्रार्थना करें जिससे दयालु प्रभु हमें सम्मानपूर्वक उन्हें ग्रहण करने में हमारी सहायता करें । वह हमें इस योग्य बनाएं, जिससे हम अत्यंत विनम्र होकर उस प्रभु का स्वागत करें जो हमारे हृदय रुपी घर में निर्वासित होने को हैं। -श्रद्धेय फा. दीपक ओसवॉल्ड डिसूज़ा पल्ली पुरोहित संत फ्रांसिस जेवियर्स चर्च अशोक नगर,कानपुर