नवधा भक्ति आखिर है क्या? जानिए यहां || ज्ञानसंजीवनि फाउंडेशन || पंकज मिश्रा जी के स्वर में ||

नवधा भक्ति आखिर है क्या? जानिए यहां || ज्ञानसंजीवनि फाउंडेशन || पंकज मिश्रा जी के स्वर में ||

#navdhabhakti, #gyansanjeevani, #ramayan, नवधा भक्ति आखिर है क्या? जानिए यहां || ज्ञानसंजीवनि फाउंडेशन || पंकज मिश्रा जी के स्वर में || तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में राम-नाम का जाप करते हुए श्रीराम के आगमन की प्रतीक्षा करने वाली शबरी का चरित्रगान करते हुए उन्हें परमभक्त के रूप में निरूपित किया है। श्रीराम जी शबरी के सामने नवधा भक्ति का का भाव प्रकट करते हुए कहते हैं : नवधा भकति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं।। प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।। गुर पद पकंज सेवा तीसरि भगति अमान। चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान।। मन्त्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा।। छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा।। सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा।। आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा।। नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना।। भक्ति नौ रूपों में की जा सकती है। प्रथम भक्ति सत्संग ही है। विद्वानों, भक्तों एवं संतों के सानिध्य में प्रभु चिंतन का ज्ञान प्राप्त होता है। दूसरी प्रकार की भक्ति जो पाप-कर्म में प्रवृत व्यक्ति को भी पवित्र करने वाली है, वह है प्रभु लीलाओं के कथा प्रसंग से प्रेम करना। जब मनुष्य भगवान की लीलाओं के प्रति लगनपूर्वक आसक्त होगा तो उन को अपने में ढालने का प्रयत्‍‌न करेगा। तीसरी भक्ति है अभिमान रहित होकर गुरू के चरण कमलों की सेवा। चौथी भक्ति में वह माना जाएगा जो छल-कपट रहित होकर श्रद्धा प्रेम व लगन के साथ प्रभु नाम सुमिरन करता है। मन्त्र का जाप और दृढ़ विश्वास-यह पांचवी भक्ति है जो वेदों में प्रसिद्ध है। छठवीं भक्ति है, जो शीलवान पुरुष अपने ज्ञान और कर्मेन्द्रियों पर नियंत्रण रखते हुए भगवद् सुमिरन करते हैं। सातवीं भक्ति में व्यक्ति सारे संसार को प्रभु रूप में देखते हैं। आठवीं भक्ति है जो कुछ मिल जाए उसी में सन्तोष करना और स्वप्न में भी पराये दोषों को ना देखना। नौवीं भक्ति है छल कपट का मार्ग छोड़ दूर रहना और किसी भी अवस्था में हर्ष और विषाद का न होना। उपरोक्त नौ प्रकार की भक्ति में कोई भी भक्ति करने वाला व्यक्ति भक्त होता है और भगवान का प्रिय होता है ज्ञानसंजीवनी फाउंडेशन आदरणीय भगवत्प्रेमियों कलिकाल के अर्थप्रधान साम्राज्य में प्रत्येक व्यक्ति जीविकोपार्जन हेतु संघर्ष पूर्ण जीवन व्यतीत करने के लिए विवश है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति चाहकर भी धार्मिक कथाएं, प्रवचन भजन कीर्तन शास्त्र सम्मत बातें, पौराणिक कथाएं, उपनिषदों के विवेचन, कर्मकांड की विधियां, संगीत आदि विधाओं को न सुन पता है न देख पाता है, अर्थात संस्कृति पतन आपकी आध्यात्मिक पक्ष को ग्रास बना चुका है, और समयाभाव के कारण आप चाह कर भी भिन्न-भिन्न स्थानों से आध्यात्मिक विधाओं का संग्रह नही कर पाते है। इन सभी आध्यात्मिक पंक्तियों के सार संग्रह के रूप में ज्ञानसंजीवनी फाउंडेशन, एक ही स्थान पर आपको उपलब्ध कराने के प्रति कटिबद्ध है। पंडित श्री शिवदास चतुर्वेदी जी के सुंदर संयोजन से संयोजित तथा एक से बढ़कर एक धर्माचार्य, प्रवचनकर्ता, कर्मकांड विशेषज्ञों ज्योतिषविदों, संगीतज्ञों, कथाकारों तथा तकनीकी विषेशज्ञों से विभूषित यह संस्था विभिन्न क्षेत्रों में कार्य कर रही है एवं एक समृद्ध समाज का निर्माण कर रही है। संस्थापक पंडित शिवदास चतुर्वेदी जी कहते हैं – ज्ञान ही हमारा मूल लक्ष्य है, यह ज्ञान सनातन मूल्यों, पद्धतियों, विचारों, सिधान्तों एवं परंपराओं में हमारे ऋषियों ने गूथ दिया है, अतः हम भारतीय सनातन संस्कृति, संस्कार, अध्यात्म, गौ, गंगा, गुरुकुल आदि संस्कृति को विश्व के हर जन-जन में समाना, बसाना, पिरोना चाहते है। यही हमारा परम पवित्र पावन उद्देश्य है, और यह हमें लगता है, की हमारे सभी सनातनी भाई-बहनों का भी यही उद्देश्य है। यह संस्था, vyaspeeth.org के माध्यम से श्रीराम कथा, श्रीमद्भागवत कथा, शिवपुराण कथा, देवी भागवतकथा अन्य पौराणिक कथाएं, कर्मकांड, ज्योतिष से संबंधित समस्त ज्ञान उपलब्ध कराती है। इसके लिए कई मूर्धन्य विद्वत्जन जैसे मानस मधुकर पूज्य संदीपचार्य जी महाराज, ष्ट्रीमती वंदना शर्मा जी, आचार्य अभिजीत जी, श्री अभिषेक तिवारी जी आदि सभी इस पुनीत कार्य में समर्पित है। आइये समाज एवं राष्ट्र कल्याण हेतु इस सेवा के कार्य में ज्ञानसंजीवनी फाउंडेशन को हम सभी मिलकर सहयोग करें एवं ज्ञान-यज्ञ में आहुति प्रदान करें। https://gyansanjeevani.com https://gyansanjeevani.org https://vyaspeeth.org   / gyansanjeevanifoundation     / vyaspeeth.org     / karmkand     / gyansanjeevani      / gyansanjeevani      / vaidiksanatan