इस मंदिर में एक अखंड ज्योति निरंतर जली रहती है एवम् कालीमठ मंदिर पर रक्तशिला, मातंगशिला व चंद्रशिला स्थित हैं | कालीमठ मंदिर में दानवो का वध करने के बाद माँ काली मंदिर के स्थान पर अंतर्ध्यान हो गयी , जिसके बाद से कालीमठ में माँ काली की पूजा की जाती है | कालीमठ मंदिर की पुनर्स्थापना शंकराचार्य जी ने की थी कहा जाता है कि भारतीय इतिहास के अद्वितीय लेखक कालिदास का साधना स्थल भी यही रहा है । इसी दिव्य स्थान पर कालिदास ने माँ काली को प्रसन्न कर विद्वता को प्राप्त किया था । इसके बाद कालीमठ मंदिर में विराजित माँ काली के आशीर्वाद से ही उन्होंने अनेक ग्रन्थ लिखे हैं , जिनमें से संस्कृत में लिखा हुआ एकमात्र काव्य ग्रन्थ “मेघदूत” जो कि विश्वप्रसिद्ध है | “रुद्रशूल” नामक राजा की ओर से यहां शिलालेख स्थापित किए गए हैं , जो बाह्मी लिपि में लिखे गए हैं । इन शिलालेखों में भी इस मंदिर का पूरा वर्णन है। मंदिर के नदी के किनारे स्थित कालीशीला के बारे में यह मान्यता है कि कालीमठ में माँ काली ने जिस शीला पर दानव रक्तबीज का वध किया , उस शीला से हर साल दशहरा के दिन वर्तमान समय में भी रक्त यानी खून निकलता है | यह भी माना जाता है कि माँ काली शिम्भ , निशुम्भ और रक्तबीज का वध करने के बाद भी शांत नहीं हुई , तो भगवान शिव माँ काली के चरणों के निचे लेट गए थे , जैसे ही माँ काली ने भगवान शिवजी के सीने में पैर रखा , तो माँ काली का क्रोध शांत हो गया और वह इस कुंड में अंतर्ध्यान हो गई , माना जाता है कि माँ काली इस कुंड में समाई हुई है और कालीमठ मंदिर में शिवशक्ति भी स्थापित है | कालीमठ मंदिर के बारे में यह मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी गयी मनोकामना या मुराद जरुर पूरी होती है इसलिए यदि आप देवभूमि उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में घूमने आते है तो दिव्य कालीमठ मंदिर के दर्शन जरुर करे और साथ ही साथ अन्य प्रसिद्ध केदारनाथ मंदिर, तुंगनाथ मंदिर, कोटेश्वर महादेेेव मंदिर, हरियाली देवी मंदिर और त्रियुगीनारायण मंदिर दर्शन कर अपनी मनोकामना पूर्ण कर सकते है। कालीमठ मंदिर तक पहुंचने के लिए सर्वप्रथम रुद्रप्रयाग से गौरीकुंड हाइवे के जरिए 42 किमी का सफर तय कर गुप्तकाशी पहुंचे । उसके बाद गुप्तकाशी से सड़क मार्ग से आठ कि.मी. सफर तय कर कालीमठ मंदिर पहुंचा जा सकता है। हर साल नवरात्रि में कालीमठ मंदिर में भक्तो की भीड़ का तांता लगा रहता है और दूर-दूर से श्रद्धालु माँ काली का आशीर्वाद लेने के लिए पहुंचते है | इस सिद्धपीठ में पूजा-अर्चना के लिए श्रद्धालु मां को कच्चा नारियल व देवी के श्रृंगार से जुड़ी सामग्री जिसमें चूड़ी, बिंदी, छोटा दर्पण, कंघी, रिबन, चुनरिया अर्पित करते हैं । देशभर में कालीमठ मंदिर एकमात्र ऐसा स्थान है जहाँ पर माँ काली , माँ सरस्वती और माँ लक्ष्मी के अलग अलग मंदिर बने हुए है | कालीमठ से माता रानी की डोली यात्रा का वीडियो • कालीमठ यात्रा (2016) मे बटखेम गाँव से मात...