कहां है राजा भोज कहा गंगू तेली ! Hahan Raja Bhoj Kahan Gangu Teli ( हिंदी & उर्दू ) कहानी

कहां है राजा भोज कहा गंगू तेली ! Hahan Raja Bhoj Kahan Gangu Teli ( हिंदी & उर्दू ) कहानी

कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू  तेली – दरबार-ए-भोज, गंगू की अकड़ और रहस्य की आहट हुज़ूर-ए-गिरामी! कानों को खोलिए, दिल को थामिए, और ज़रा आँखें मूँद लीजिए कि आपको उस ज़माने में ले चलूँ जहाँ हर गली में तांबे की घंटियाँ बजतीं, हर किले की दीवारों पर मशालें जलतीं, और हर दरबार में शायरी और तलवार एक साथ दमकते। वो ज़माना था जब मालवा की सरज़मीन पर एक ऐसा बादशाह राज करता था जिसका नाम सुनकर फ़क़ीर दुआ देते और दुश्मन थरथराते – वो थे राजा भोज। लोग कहते – “भोज की रियासत में न इंसाफ़ भूखा सोता है, न ज़ालिम चैन से।” दरबार में संगमरमर के फर्श, सोने की जड़ाई वाले खंभे, और छत से झूलते हजारों दीयों की रौशनी में महफ़िलें सजतीं। सुबह से शाम तक विद्वान, फ़क़ीर, वीर और शायर आते, अपनी कला दिखाते, और भोज दरबार की रौनक बढ़ाते। राजा भोज की सबसे बड़ी पहचान थी – उनकी इनायत और अक्ल। वो कहते – "तलवार से ज़्यादा तेज़ अगर कुछ है, तो वो इंसान का दिमाग़ है।" मगर, हुज़ूर, हर रियासत में एक ऐसा किरदार भी होता है जो न राजा है, न फ़क़ीर, लेकिन शोर इतना मचाता है कि महफ़िल उसी की बातें करने लगती है। और भोज की रियासत में यह किरदार था – गंगू तेली। गंगू नाम तो मामूली – तेल बेचने वाला। मगर अकड़ ऐसी, जैसे ख़ुदा ने उसे ज़मीन-आसमान की चाबी दे दी हो। कपड़े तो साधारण, मगर कमर में हमेशा एक रेशमी पटका बाँधता, सिर पर तुड़ी-मुड़ी पगड़ी, और तेल की चमक से सना चेहरा। जहाँ बैठता, लोगों से कहता – "अरे भइया, सोचो तो! राजा भोज भी तो रोटी खाता है, मैं भी। साँस लेता है, मैं भी। सोता है, मैं भी। फिर फर्क क्या? अगर वो राजा है तो मैं भी उससे कम नहीं!" गली-कूचे में लोग उसकी बात सुनकर ठहाके लगाते, मगर गंगू अपनी अकड़ में कहता – "हँसो, हँसो! एक दिन देखना, भोज मुझे दरबार में बुलाएगा और मैं उसके बगल में बैठूँगा।" जनाब! बात ही बात में उसकी ये बकवास दरबार तक पहुँच गई। नवरत्नों ने राजा भोज से कहा – "हुज़ूर, ये गंगू तेली अब हर जगह आपका नाम लेकर अपनी बराबरी करता है। लोग मज़ाक में हँसते हैं, मगर कहीं यह उसकी अकड़ लोगों को भरमाने न लगे।" राजा भोज ने हल्की मुस्कान के साथ कहा – "अकड़ अगर जुबान तक है, तो हँसी में उड़ जाएगी। मगर अगर दिल में उतर गई, तो सबक़ सिखाना ज़रूरी है। कल का दरबार गंगू के नाम होगा। देखना, उसकी अकड़ कैसे खुद-ब-खुद पिघलती है।" अगले दिन, हुज़ूर, सुबह-सुबह गंगू को शाही फ़रमान मिला – "राजा भोज तुम्हें अपने खास दरबार में बुलाते हैं। तैयार होकर आओ।" गंगू का सीना गर्व से फूल गया। "देखा! मैंने कहा था न? अब भोज समझ गया कि गंगू तेली कोई मामूली नहीं।" वो नहा-धोकर, बालों में तेल की मोटी परत चढ़ाकर, चमकीली धोती और पुरानी मगर चमकाई हुई जूती पहनकर निकला। दो-तीन नौकर उसके पीछे, हाथ में छोटे-छोटे उपहार – तिल का तेल, कुछ सिक्के, और एक टूटी-सी इत्र की शीशी – लेकर चल पड़े। गंगू बार-बार कहता – "भोज भी देखेगा, गंगू तेली किसी से कम नहीं। आज से मैं भी दरबार का आदमी!" दरबार पहुँचा तो देखा – संगमरमर का फर्श, सोने के खंभे, और बीच में एक बड़ा-सा संदूक़ रखा हुआ, जिस पर तीन ताले लगे थे। राजा भोज अपने सिंहासन पर बैठे, चारों ओर नवरत्न और दरबारी, और सैकड़ों लोग तमाशबीन। भोज ने गहरी नज़र से गंगू की ओर देखा और कहा – "गंगू, आज तुझे अपनी अकड़ साबित करने का मौक़ा मिलेगा। इस संदूक़ का राज़ जो खोलेगा, वही दरबार का सरदार बनेगा। अगर तू सच में सोचता है कि राजा भोज और गंगू तेली एक हैं, तो आगे बढ़ और साबित कर!" गंगू ने अकड़ते हुए ठहाका लगाया – "हुज़ूर, ये तो बच्चों का खेल है। देखते जाइए, गंगू तेली आज दरबार में कैसे कमाल दिखाता है!" वो संदूक़ की ओर बढ़ा… मगर, हुज़ूर, जैसे ही उसने ताले को हाथ लगाया – पूरे दरबार की रोशनी बुझ गई! दीपक, मशालें, सब एकदम से बुझ गए। चारों तरफ़ अंधेरा, सिर्फ़ एक ठंडी हवा और कानों में गूँजती फुसफुसाहट – "जिसने लालच किया, उसका अंजाम बुरा हुआ…" लोग सिहर उठे। राजा भोज शांत बैठे, मगर आँखों में एक चमक थी। और गंगू तेली? – उसके माथे से पसीना टपकने लगा। यहीं, हुज़ूर, से असली दास्तान शुरू होती है… अगले हिस्से में सुनिए क्या निकला उस रहस्यमय संदूक़ से, कैसे गंगू की अकड़ हँसी और खौफ़ दोनों में बदलती है, और कैसे एक बूढ़ा फ़क़ीर गंगू को एक खतरनाक चाल में फँसाता है दास्तान-ए-राजा भोज ओ गंगू तेली (कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली)