"जेष्ठ पूर्णिमा" की रात चुपचाप यहां रख दें 10 रुपए का सिक्का हो जाओगे मालामाल 24 घंटे में देखें चमत्कार #sikkaTotka 3 जून "जेष्ठ वट पूर्णिमा" जो भी हो दुख-दर्द धनहानि सबसे मुक्ति दिलाएगा लाल मिर्च दुश्मन का विनाश #jyesthaPurnima #jyeshthaVatPurnima #lalMirchTotka #vatPurnima #जेष्ठपुर्णिमा #पुर्णिमा #purnima #वटपुर्णिमा #vatShavitriVart ज्येष्ठ माह में आने वाली पूर्णिमा का हिन्दू धर्म में बड़ा महत्व है। धार्मिक दृष्टिकोण से पूर्णिमा के दिन स्नान और दान-धर्म करने का विधान है। इस दिन गंगा में स्नान करने से व्यक्ति की मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। माना गया है कि ऐसा करने से व्यक्ति के सभी पापों का नाश हो जाता है। इसके साथ ही इस दिन दान करने से पितरों का भी भला होता है और उन्हें मुक्ति की प्राप्ति होती है। इसीलिए इस दिन ख़ास तौर पर महिलाओं को व्रत करने की सलाह दी जाती है। इस दिन विशेष रूप से भगवान शंकर व भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिये। ज्येष्ठ पूर्णिमा व्रत का महत्व और पूजा विधि तथा उपाय ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन स्नान, ध्यान और पुण्य कर्म करने का विशेष महत्व है। इसके साथ ही यह दिन उन लोगों के लिये भी बेहद महत्वपूर्ण होता है, जिन युवक और युवतियों का विवाह होते होते रुक जाता है या फिर उसमें किसी प्रकार की कोई बाधा आ रही होती है। ऐसे लोग यदि आज के दिन श्वेत वस्त्र धारण करके शिवाभिषेक करें और भगवान शिव की पूजा करें तो उनके विवाह में आने वाली हर समस्या दूर हो जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन कोई भी कुछ खास उपाय करके इस शुभ तिथि से शुभ लाभ उठा सकता है, आइये जानें ज्येष्ठ पूर्णिमा के उपाय:- ● इस विशेष दिन पीपल के पेड़ पर भगवान विष्णु संग माँ लक्ष्मी वास करती हैं। इसलिए यदि कोई व्यक्ति एक लोटे में पानी भर कर उसमें कच्चा दूध और बताशा डालकर पीपल के पेड़ को अर्पित करता है तो इससे उस व्यक्ति को रुका हुआ धन प्राप्त होगा और उसे बिज़नेस में भी लाभ मिलेगा। ● इस दिन दंपत्ति को चंद्र देव को दूध से अर्ध्य देना चाहिए। इससे उनके जीवन में आ रही हर छोटी-बड़ी समस्या दूर हो जाती है। यह काम पति या पत्नी किसी के भी द्वारा किया जा सकता है। ● आज की रात यदि कोई किसी कुएं में एक चम्मच से दूध डालता है तो उसका भाग्य चमक जाता है। साथ ही यदि उसे किसी भी जरूरी कार्य में कोई बाधा आ रही होती है तो वो भी तुरंत दूर हो जाती है। ● यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में कोई ग्रह दोष है तो उसे दूर करने के लिए आज, पीपल और नीम की त्रिवेणी के नीचे विष्णु सहस्त्रनाम या शिवाष्टक का पाठ करना सबसे बेहतर होगा। ● ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन माँ लक्ष्मी की तस्वीर पर 11 कौड़ियां चढ़ा कर उस पर हल्दी से तिलक लगाना चाहिए। इसके पश्चात अगली सुबह इन्हें किसी लाल कपड़े में बांध कर अपनी तिजोरी में रख दें। ऐसा करने से आपकी आर्थिक स्थिति बेहतर होती है। जेष्ठ वट पूर्णिमा के दिन - स्नान, व्रत एव दान-पुण्य के कार्य करने से जातकों को शुभ फल प्राप्त होते हैं।इस तिथि को जेठ पूर्णिमा या जेठ पूर्णमासी कहा जाता है। हिन्दू धर्म में पूर्णिमा तिथि का विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन पवित्र नदी अथवा जलकुंड में स्नान, व्रत एवं दान-पुण्य के काम करने की मान्यता है। इस दिन वट पूर्णिमा व्रत रखा जाता है और कबीरदास जयंती भी मनाई जाती है। हिन्दू पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ पूर्णिमा तिथि गुरुवार के दिन पड़ रही है। सूर्य और चंद्रमा क्रमशः मिथुन और वृश्चिक राशि में स्थित होंगे। पूर्णिमांत के अनुसार, यह तिथि ज्येष्ठ माह की अंतिम तिथि होती है। इसके बाद आषाढ़ माह प्रारंभ हो जाता है। आइए जानते हैं ज्येष्ठ पूर्णिमा तिथि का मुहूर्त, व्रत विधि और महत्व के बारे में… ज्येष्ठ पूर्णिमा तिथि का महत्व ज्येष्ठ पूर्णिमा को वट पूर्णिमा व्रत रखा जाता है। यह व्रत महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण के राज्यों में विशेष रूप से रखा जाता है, जबकि उत्तर भारत में यह व्रत वट सावित्री के रुप मे मनाया जाता हैं, जो ज्येष्ठ माह की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को पड़ता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन सावित्री ने अपने पति के प्राण यमराज से वापस लेकर आईं थी। यही वजह है कि विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुख समृद्धि के लिए इस व्रत को रखती हैं। संत कबीर का जन्म ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन हुआ था। इसलिए प्रति वर्ष ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन उनकी जयंती मनाई जाती है। कबीरदास भक्तिकाल के प्रमुख कवि थे, वे ज्ञानाश्रयी-निर्गुण शाखा की काव्यधारा के प्रवर्तक थे। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन समाज कि बुराइयों को दूर करने में लगा दिया। दोहे के रूप में उनकी रचनाएं आज भी गायी गुनगुनाई जाती हैं। पूर्णिमा व्रत विधि पूर्णिमा (Jyeshtha Purnima) के दिन सुबह स्नान से पहले व्रत का संकल्प लें। पवित्र नदी या कुंड में स्नान करें और स्नान से पूर्व वरुण देव को प्रणाम करें। स्नान के पश्चात सूर्य मंत्र का उच्चारण करते हुए सूर्य देव को अर्घ्य देना चाहिए। स्नान से निवृत्त होकर भगवान मधुसूदन की पूजा करनी चाहिए और उन्हें नैवेद्य अर्पित करना चाहिए। अंत में ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा दें