संक्षिप्त शिवपुराण — संहिता 4: कोटिरुद्रसंहिता: अध्याय 23 – वाराणसी तथा विश्वेश्वर का माहात्म्य

संक्षिप्त शिवपुराण — संहिता 4: कोटिरुद्रसंहिता: अध्याय 23 – वाराणसी तथा विश्वेश्वर का माहात्म्य

सूतजी कहते हैं – मुनीश्वरो ! मैं संक्षेप से ही वाराणसी तथा विश्वेश्वर के परम सुन्दर माहात्म्य का वर्णन करता हूँ, सुनो। एक समय की बात है कि पार्वतीदेवी ने लोकहित की कामना से बड़ी प्रसन्नता के साथ भगवान् शिव से अविमुक्त क्षेत्र और अविमुक्त लिंग का माहात्म्य पूछा। तब परमेश्वर शिव ने कहा – यह वाराणसीपुरी सदा के लिये मेरा गुह्यतम क्षेत्र है और सभी जीवों की मुक्ति का सर्वथा हेतु है। इस क्षेत्र में सिद्धगण सदा मेरे व्रत का आश्रय ले नाना प्रकार के वेष धारण किये मेरे लोक को पाने की इच्छा रखकर जितात्मा और जितेन्द्रिय हो नित्य महायोग का अभ्यास करते हैं। उस उत्तम महायोग का नाम हैं पाशुपात योग। उसका श्रुतियों द्वारा प्रतिपादन हुआ है। वह भोग और मोक्षरूप फल प्रदान करने वाला है। महेश्वरि ! वाराणसीपुरी में निवास करना मुझे सदा ही अच्छा लगता है। जिस कारण से मैं सब कुछ छोड़कर काशी में रहता हूँ, उसे बताता हूँ, सुनो। जो मेरा भक्त तथा मेरे तत्त्व का ज्ञानी है, वे दोनों अवश्य ही मोक्ष के भागी होते हैं। उनके लिये तीर्थ की अपेक्षा नहीं है। विहित और अविहित दोनों प्रकार के कर्म उनके लिये समान हैं। उन्हें जीवन्मुक्त ही समझना चाहिये। वे दोनों कहीं भी मरें, तुरंत ही मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं। यह मैंने निश्चित बात कही है। सर्वोत्तमशक्ति देवी उमे ! इस परम उत्तम अविमुक्त तीर्थ में जो विशेष बात है, उसे तुम मन लगाकर सुनो।