एक समय महर्षि विश्वामित्र अपने आश्रम में अन्य ऋषि-मुनियों के साथ जनकल्याण के लिए यज्ञ कर रहे थे। आश्रम के ऊपर आकाश में विचरण कर रहे मायावी राक्षसों सुबाहु व मारीच को विश्वामित्र के द्वारा किया जा रहा यज्ञ पसंद नहीं आता है और वे दोनों जानवरों के माँस, हड्डियों और खून को हवन कुण्ड में डालकर उस यज्ञ को विध्वंस कर देते है। यज्ञ के नियमों के अनुसार विश्वामित्र क्रोध नहीं कर सकते थे, इसलिए चाह कर भी वह उन्हें श्राप भी नहीं दे पाए। अतः वह सहायता के लिए अयोध्या के राजा दशरथ के पास जाते है और जहाँ दशरथ उनका आतिथ्य सत्कार करते है। आतिथ्य सत्कार से प्रसन्न होकर विश्वामित्र दशरथ को अपने अयोध्या आने का उद्देश्य बताते है कि असुरों के उत्पात के कारण यज्ञ और आध्यात्मिक साधना पूरी नहीं हो पा रही है। लंका के राजा रावण के मायावी गुप्तचर सुबाहु और मारीच उनका कोई भी अनुष्ठान पूरा नहीं होने दे रहे है। अतः हमें अपना पुत्र राम दे दो, जिससे हमारी रक्षा का उपाय हो जाएगा। लेकिन दशरथ नन्हे से बालक राम की जगह असुरों का सामना स्वयं अपनी सेना के साथ करने के लिए कहते है। जिससे विश्वामित्र क्रोधित हो जाते है और कुलगुरु वशिष्ठ की ओर देखते हुए कहते है कि राजा दशरथ अभी तक राम के दिव्य तेज को नहीं देख पाए है, अतः आप ही इन्हें समझाए। वशिष्ठ जी दशरथ की शंकाओं का निवारण करते हुए कहते है कि राम का नाम धर्म और संस्कृति की पहचान बनेगा, इसलिए विश्वामित्र राम के कल्याण के लिए आए है। वशिष्ठ जी के द्वारा आश्वस्त किए जाने पर दशरथ अपने पुत्रों राम और लक्ष्मण को विश्वामित्र के साथ तपोवन में भेज देते है। राम और लक्ष्मण के संरक्षण में विश्वामित्र पुनः यज्ञ करना प्रारम्भ करते है, जिसे देख सुबाहु और मारीच पुनः यज्ञ को ध्वस्त करने का प्रयास करते है, लेकिन राम और लक्ष्मण के तीर उनका संहार कर देते है, सुबाहु उसी समय मर जाता है और मारीच घायल होकर समुद्र तट पर जाकर गिरता है। "वेद-पुराणों और धार्मिक ग्रंथों के अनुसार परम ईश्वर श्री हरि ने समय-समय पर धर्म की हानि को रोकने और अधर्म के विनाश करने के लिए मानव रूप में अवतार लिया और मानव कल्याण के लिए धर्म की पुनःस्थापना की तथा साथ-साथ अपने भक्तों का उद्धार भी किया। क्योंकि अवतार लेने का उद्देश्य केवल अधर्मियों का विनाश करना ही नहीं होता था बल्कि जनमानस में ईश्वर के प्रति भक्ति और उनके विश्वास को दृढ़ करना भी था। भगवान श्री राम ने जब त्रेतायुग में अवतार लिया, तब उन्होंने केवल रावण का वध ही नहीं किया बल्कि इस अवतार के माध्यम से अपने अनेकों भक्तों का उद्धार भी किया। आपका प्रिय धार्मिक चैनल तिलक अपनी इस शृंखला में भगवान श्री राम के द्वारा किए अपने भक्तों के उद्धार की कथाओं को प्रस्तुत कर रहा है। भक्ति भाव से इनका आनन्द लीजिए और तिलक से जुड़े रहिए। #tilak #ramayan #katha #uddharkatha #ramayanuddharkatha"