Friday Fast Vaibhav Laxmi Vrat katha: शुक्रवार के दिन रखें वैभव लक्ष्मी व्रत, जानें कथा,महिमा |वैभव लक्ष्मी व्रत की पूजन विधि (Vaibhav Laxmi Vrat Pujan Vidhi) #vaibhavlakshmi #vaibhavlakshmivrat Vaibhav Laxmi Vrat Vidhi : घर में कोई रखता है वैभव लक्ष्मी का व्रत, तो इन बातों को जान लें शुक्रवार को पूरे दिन व्रत रखने के बाद शाम को स्नान करें। पूजन करने के लिए पूर्व दिशा की ओर मुख करके आसन पर बैठ जाएं। उसके बाद चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर वैभव लक्ष्मी की तस्वीर या मूर्ति स्थापित करें और श्रीयंत्र को तस्वीर के पीछे या बगल में रखें। माँ वैभव लक्ष्मी व्रत का महत्व क्या है? ( Maa Vaibhav Laxmi Vrat ka mahatva kya hai? ) माता लक्ष्मी के आठ रूपों में से एक रूप को वैभव लक्ष्मी कहा जाता है। हिन्दू धर्म में माँ वैभव लक्ष्मी व्रत को धन, वैभव, सुख और समृद्धि प्राप्त करने के लिए किया जाता है। देवी लक्ष्मी के इस व्रत को स्त्री या पुरुष कोई भी रख सकता है। जिन लोगों के जीवन में आर्थिक संकट लम्बे समय से बना हुआ है और या फिर वे गृह कलेश आदि से परेशान हैं तो उन्हें इस व्रत का पालन अवश्य ही करना चाहिए। आज के इस लेख में हम माता वैभव लक्ष्मी की महिमा, Lakshmi ji ki Kahani, उनकी पूजा विधि और व्रत नियमों और कुछ महत्वपूर्ण सवालों के बारे में जानेंगे। वैभव लक्ष्मी व्रत पूजा कैसे करें? ( Vaibhav Laxmi Vrat puja kaise karen? ) आइये जानें Vaibhav Laxmi Vrat Vidhi : 1. शुक्रवार के दिन ब्रह्ममुहूर्त में स्नानादि कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। 2. एक चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर माता लक्ष्मी की प्रतिमा रखें। 3. माता को श्वेत या लाल पुष्प अर्पित करते हुए व्रत का संकल्प लें। 4. इसके बाद माँ लक्ष्मी को लाल या श्वेत चन्दन का तिलक लगाएं। 5. इसके उपरान्त माता वैभव लक्ष्मी को अक्षत, फल, कमलगट्टा चढ़ाएं। 6. फिर घी का दीपक और धूप जलाकर माता लक्ष्मी की आरती करें। 7. अब आसन पर बैठकर माँ लक्ष्मी बीज मंत्र का 108 बार जाप स्फटिक माला से करें। ”ऊँ श्रींह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ऊँ महालक्ष्मी नम:।।” 8. अपनी आर्थिक समस्या से निजात पाने के लिए इसी दिन Dhan Laxmi Kuber Yantra को घर में स्थापित करें। 9. माता लक्ष्मी की विधिपूर्वक उपासना करने से माँ अवश्य ही अपने भक्तों से प्रसन्न होती हैं। वैभव लक्ष्मी व्रत के नियम ( Vaibhav Lakshmi Vrat ke niyam ) 1. व्रत वाले दिन ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नानदि क्रिया से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लें। 2. पूरे दिन निराहार रहकर एक ही बार भोजन ग्रहण करें। 3. मन और शरीर को शुद्ध रखें, बुरे विचार न आने दें। 4. किसी का दिल न दुखाये, कोमल वाणी का ही प्रयोग करें। वैभव लक्ष्मी व्रत के फायदे ( Vaibhav Lakshmi Vrat ke fayde ) 1. मन को शांत और स्थिर रखने के लिए फायदेमंद है। 2. आध्यात्मिक और सकारात्मक विचारों को बढ़ावा मिलता है। 3. दरिद्रता और आर्थिक संकटों को दूर करने में सहायक 4. घर से बुरी शक्तियां दूर रहती हैं। 5. लम्बे समय से चले आ रहे गृह कलेश की समाप्ति होती है। वैभव लक्ष्मी व्रत कथा ( Vaibhav Laxmi Vrat Katha ) वैभव लक्ष्मी की कहानी ( Lakshmi Mata ki kahani ) कुछ इस प्रकार है कि एक समय जब शहरी जीवन शुरू हो चुका था। सभी लोग भागदौड़ में व्यस्त थे, लोग अपनी जरूरतों को पूरे करने के पीछे इस तरह भाग रहे थे कि उन्हें पूजा-पाठ या ईश्वर, भक्ति या दया भाव आदि से कोई मतलब नहीं रह गया था। दिन पर दिन व्यक्ति पर बुराइयां हावी पड़ रहीं थी। इन सभी बुराइयों के बीच कुछ लोग सभी भी सात्विक स्वभाव के भी रहते थे जिनमें शीला नामक स्त्री भी शामिल थी। शीला काफी शांत स्वभाव वाली और धार्मिक मान्यताओं में विश्वास करने वाली स्त्री थी। शीला का पति भी उसी की तरह सुशील और सात्विक था। दोनों भगवान के पूजन करते हुए और सत्कर्म करते हुए अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे। जैसे-जैसे समय बीता शीला का पति भी उसी भीड़ में शामिल हो गया जो बुरे कार्यों में लिप्त थे। अब शीला के पति के मन में केवल एक ही स्वप्न था किसी भी हालत में करोड़पति बनना। कारोड़पति बनने की लालसा शीला और उसके पति को जल्द ही दरिद्रता के मोड़ पर ले आई और वे भिक्षा मांगने तक की कगार पर आ खड़े हुए। शराब, जुआ, नशीले पदार्थों का सेवन, मांसाहारी भोजन का ग्रहण ये सब अब शीला के पति की दिनचर्या का एक हिस्सा बन चुके थे। उसने अब अपनी सारी धन दौलत जुए में गंवा दिया। वैभव लक्ष्मी माता की कहानी ( Vaibhav Lakshmi maa ki kahani ) आगे अब इस तरह है कि यह सब दृश्य देख शीला अत्यंत चिंतित रहने लगी अब वह अपना सारा समय भगवान की भक्ति में ही लगाया करती। एक दिन किसी ने शीला के द्वार पर दस्तक दी। शीला ने जब द्वार खोला तो वहां एक मांजी खड़ी हुई थीं। वह कोई सामान्य मांजी नहीं बल्कि कोई तेजस्विनी की भांति लग रही थी। मांजी के नेत्रों से मानो अमृत बह रहा हो। शीला ने जैसे ही मांजी को देखा उसका शरीर तो जैसे पावन ही हो गया। उसका रोम-रोम खिल उठा। शीला उन्हें घर के अंदर ले आई और एक फटी हुई चादर पर मांजी को बिठा दिया। अब मांजी बोलीं कि शीला क्या तुमने मुझे पहचाना? तुम हर शुक्रवार माता लक्ष्मी के मंदिर जाया करती थीं मैं भी वहां माता लक्ष्मी के भजन-कीर्तन के लिए आती थी। तुम्हें मैंने बहुत दिनों से मंदिर में नहीं देखा तो सोचा तुम्हारा हाल-चाल जान लूँ। शीला को मांजी की बातों को सुनकर जैसे प्रेम भाव में बहती चली गई। उससे रहा नहीं गया और वह बिलख-बिलख कर रोने लगी। शीला को रोते देख मांजी ने उसे संभाला और कहा कि जीवन में सुख-दुःख तो धूप छाँव की भांति आते रहते है ऐसे समय में तुम्हे खुद पर और ईश्वर पर विश्वास करना चाहिए। Copyright: sastra_Gyan Singer: Babita