अल्लाह तआला इस आयत में निकाह के एक अहम हुक्म को बयान फरमाते हैं। अल्लाह कहता है कि औरतों को उनका महर खुशी और दिल की रज़ामंदी के साथ अदा करो। महर औरत का हक़ है, उस पर किसी का ज़ोर या ज़बरदस्ती नहीं होनी चाहिए। अगर औरत अपनी खुशी से महर का कोई हिस्सा माफ़ कर दे, तो मर्द उसे जायज़ और पाक समझकर इस्तेमाल कर सकता है। इस आयत से यह साबित होता है कि इस्लाम ने औरत को इज़्ज़त, हक़ और आर्थिक सुरक्षा दी है