भजन की शुरुआत ही प्रणाम और चरण-वंदना से होती है, जो भारतीय सनातन परंपरा में गुरु के प्रति सर्वोच्च सम्मान का प्रतीक है। इसमें “चरणों की धूल” का उल्लेख यह दर्शाता है कि शिष्य गुरु की कृपा को किसी भौतिक उपहार से नहीं, बल्कि उनकी चरण-रज जैसी पवित्र और अमूल्य कृपा से प्राप्त करना चाहता है। शिष्य कहता है कि यदि गुरु का आशीर्वाद मिल जाए, तो जीवन के सभी अंधकार मिट जाते हैं, मन का अहंकार समाप्त हो जाता है और आत्मा में भक्ति का अमृत प्रवाहित होने लगता है। इस भजन में गुरु को ज्ञान का सागर, करुणा का स्रोत, और भवसागर से पार लगाने वाली नौका कहा गया है। यह भवसागर यानी संसार के दुःख, भ्रम, माया और उलझनों से भरी यात्रा का रूपक है। शिष्य मानता है कि संसार में चाहे कितनी भी भटकन हो, लेकिन गुरु का हाथ पकड़ लेने पर हर संकट सरल हो जाता है। गुरु की कृपा वह शक्ति है, जो डूबते को सहारा देती है, टूटते को बल देती है और भटके को सही राह दिखाती है। भजन में भाव यह भी है कि गुरु का प्रेम संसार के सभी रिश्तों से अधिक गहरा और निःस्वार्थ होता है। जहाँ दुनिया दोष देखती है, वहाँ गुरु संभावनाएँ देखते हैं। जहाँ मन हार जाता है, वहाँ गुरु उम्मीद जगाते हैं। शिष्य अपने सभी कर्म, विचार और अस्तित्व गुरु को समर्पित करते हुए कहता है कि “मैं कुछ भी नहीं, जो कुछ भी हूँ आपकी कृपा से हूँ।” यह समर्पण-भाव इस भजन की आत्मा है। संगीत की दृष्टि से भी यह भजन कोमल सुरों में गाया जाता है, अक्सर हारमोनियम, तबला, बाँसुरी या संत-संगत की सामूहिक धुन के साथ, जिससे इसकी मधुरता और बढ़ जाती है। इसे सुनते समय मन सहज ध्यान की अवस्था में उतरने लगता है, आँखें नम हो जाती हैं और हृदय कृतज्ञता से भर उठता है। यह भजन केवल सुनने का नहीं, बल्कि अनुभव करने का गीत है—जहाँ हर शब्द प्रार्थना बन जाता है और हर स्वर आशीर्वाद जैसा प्रतीत होता है। संदेश: