सनातन परंपरा में नाथ संप्रदाय वह दिव्य धारा है, जहाँ शिव-तत्व गुरु-रूप में प्रकट होकर साधक को योग, भक्ति, वैराग्य, और आत्म-बोध की दीक्षा देता है। “अलख निरंजन” नाथ-योगियों का वह अमर घोष-मंत्र है, जो निर्गुण-निराकार ब्रह्म की वंदना करता है—जिसे आँखों से देखा नहीं जा सकता (अलख), जो माया-दोषों से परे, शुद्ध और निष्कलंक है (निरंजन). यह मंत्र शिव, गोरखनाथ, और ब्रह्म-तत्व—तीनों की एकात्म अनुभूति का प्रतीक है। माता चंचल नाथ और चंचलनाथ जी का नाम जब इस मंत्र के साथ जुड़ता है, तो यह संकेत देता है कि माँ-स्वरूप करुणा और गुरु-स्वरूप संरक्षण—दोनों मिलकर साधक के भीतर उस अलख-ज्योति को जाग्रत करते हैं, जो अमंगल, दुख, भय, भ्रम और अज्ञान को जड़ से हर लेती है। यह भजन नाथ-भक्ति, शिव-तत्व, गुरु-तत्व और माँ-कृपा के संगम से उपजा वह मधुर कीर्तन है, जिसमें भक्त कहता है: “अलख निरंजन, अलख निरंजन, जय अलख निरंजन, हर-हर अलख निरंजन…” यह केवल नारा नहीं—यह ध्यान, श्वास-जप, और आत्म-अनुभूति का कंपन है। भजन का मूल भाव इस भजन में तीन प्रमुख भाव धाराएँ साथ बहती हैं: 1. माँ की करुणा (माता चंचल नाथ) • जो बिना माँगे भी प्रेम देती है • जो शिष्य/भक्त की रक्षा करती है • जो अंतःकरण को कोमल बनाती है • जो दुख में भी आशा जगाती है 2. गुरु की छत्र-छाया (चंचलनाथ/नाथ परंपरा) • जो योग-मार्ग का मार्गदर्शक है • जो साधक को वैराग्य देता है • जो मन की चंचलता को साधना में बाँध देता है • जो शक्ति और अनुशासन देता है 3. शिव-ब्रह्म का निर्गुण स्वर (अलख निरंजन) • जो सृष्टि के मूल में है • जो देह, मन, बुद्धि और आत्मा—सबमें व्याप्त है • जिसका नाम लेने से नकारात्मक ऊर्जा क्षीण हो जाती है • जो योगियों की चेतना का अंतिम सत्य है चौपाई/मंत्र “अलख निरंजन” का विस्तृत अर्थ “अलख” अर्थ: जिसे इंद्रियों से देखा या समझा नहीं जा सकता; जो अनुभूति का विषय है, तर्क का नहीं। “निरंजन” अर्थ: जो माया-मल, दोष, अहंकार, क्रोध, मोह, भय और अज्ञान—सबसे परे, पूर्ण शुद्ध है। “जय” अर्थ: विजय-घोष; यह संकेत कि जिस चेतना में यह नाम उतर गया, वहाँ अज्ञान पर ज्ञान की, भय पर विश्वास की, और दुख पर आनंद की विजय निश्चित है। यह मंत्र यह नहीं कहता कि ईश्वर कहीं दूर है—यह कहता है कि: “वह अलख-निरंजन तत्व तुम्हारे भीतर, तुम्हारे ऊपर, तुम्हारे चारों ओर और तुम्हारी सांसों में पहले से मौजूद है—बस तुम्हें उसे जगाना है।” भजन का आध्यात्मिक विवेचन 1. देह भी शिव-तत्व से संचालित जब भजन कहता है—अलख निरंजन, तो इसका अर्थ: • शरीर में जो प्राण-शक्ति है, वह भी शिव-अंश है • शरीर की ऊर्जा भी उसी स्रोत से आती है • देह को यदि पवित्र कर्म में लगाया जाए, तो वह मंदिर बन जाता है 2. मन की चंचलता को गुरु-मंत्र से स्थिरता “माता चंचल नाथ” नाम में ‘चंचल’ शब्द संकेत देता है कि: • मन स्वभाव से चंचल है • पर गुरु की शरण में यह चंचलता नष्ट नहीं होती—साधना में परिवर्तित हो जाती है • चंचलता यदि सही दिशा पा ले, तो वही भक्ति-नृत्य बन जाती है 3. नाम-जप = अनाहत साधना इस भजन में जप केवल होंठों से नहीं—हृदय, रोम, और श्वास से होता है। नाथ-योग में कहा गया: “हंसा – सोहं” (सांस भीतर “हं”, बाहर “सा”) पर प्रेम-भक्ति में सांस भीतर “राधा”, बाहर “कृष्ण”; और नाथ-योग में सांस भीतर-बाहर दोनों में “अलख निरंजन।” जहाँ सांस नाम जपे, वहाँ: • चिंता ठहर नहीं सकती • भय टिक नहीं सकता • मानसिक कलह समाप्त हो जाती है • साधक भीतर से शक्तिशाली अनुभव करता है 4. माँ और गुरु दोनों = शिव-कृपा के दो रूप माँ प्रेम देती है, गुरु दिशा देता है— और दोनों मिलकर साधक को शिव-तत्व तक पहुँचाते हैं। 5. भव-बंधन से मुक्ति अलख निरंजन का स्मरण उस भव-बंधन को काट देता है, जो: • हमें दुख से बाँधता है • हमें स्वार्थ से बाँधता है • हमें अपेक्षा से बाँधता है • हमें भ्रम से बाँधता है यह भजन साधक को कहता है: