श्री रामचरितमानस में श्रृंगवेरपुर (Shringverpur) से जुड़ी कई महत्वपूर्ण चौपाइयाँ हैं, जो निषादराज गुह के साथ भगवान राम के मिलन, उनकी सेवा और वनवास की शुरुआत के दृश्यों का वर्णन करती हैं, जैसे "भयउ बिषादु निषादहि भारी। राम सीय महि सयन निहारी॥" और "पुनि मन बचन कर्म रघुनायक। चरन कमल बंदउँ सब लायक॥", जो प्रभु के चरणों में समर्पण और प्रजा के दुःख को दर्शाती हैं, खासकर जब राम और सीता को धरती पर सोया देखकर निषाद को कष्ट होता है, जो उनके सरल स्वभाव और प्रजा के प्रेम को दिखाता है। यहाँ श्रृंगवेरपुर से जुड़ी कुछ प्रमुख चौपाइयाँ और उनके अर्थ दिए गए हैं: 1. निषाद के दुःख का वर्णन: चौपाई: "भयउ बिषादु निषादहि भारी। राम सीय महि सयन निहारी॥" अर्थ: राम और सीता को जमीन पर सोते देख निषादराज को बहुत दुःख हुआ। 2. निषाद द्वारा सेवा: चौपाई (संबंधित): "जोगवहिं जिन्हहि प्रान की नाईं। महि सोवत तेइ राम गोसाईं॥" अर्थ: जिनकी सब अपने प्राणों की तरह सार-संभाल करते थे, वही गोस्वामी राम आज धरती पर सो रहे हैं। 3. प्रभु के चरणों में समर्पण (सामान्य, पर उस प्रसंग में महत्वपूर्ण): चौपाई: "पुनि मन बचन कर्म रघुनायक। चरन कमल बंदउँ सब लायक॥" अर्थ: फिर मन, वचन और कर्म से श्री रघुनाथजी के चरण-कमलों में, जो सब प्रकार से वंदना करने योग्य हैं, मैं वंदना करता हूँ। 4. प्रजा के मन की व्यथा: चौपाई (संबंधित): "कैकयनंदिनि मंदमति कठिन कुटिलपन कीन्ह। जेहिं रघुनंदन जानकिहि सुख अवसर दुखु दीन्ह॥" अर्थ: कैकेयी ने जो कुटिलता की, उसने राम और सीता को सुख के समय दुःख दिया। 5. सामान्य, पर संकट में उपयोगी चौपाई (जो अक्सर श्रृंगवेरपुर के प्रसंगों में भी पढ़ी जाती है): चौपाई: "मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी॥" अर्थ: जो मंगल करने वाले और अमंगल हरने वाले हैं, वे दशरथ नंदन श्री राम मुझ पर कृपा करें। ये चौपाइयाँ श्रृंगवेरपुर के प्रसंग में राम के वनवास के प्रारंभिक दुःख, प्रजा और निषाद के प्रेम, और राम-सीता की सादगी को दर्शाती हैं, जिसे गोस्वामी तुलसीदास जी ने बहुत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है।