हे गुरुदेव प्रणाम आपके चरणों में — भक्ति, समर्पण और आत्म-चेतना का दिव्य भजन भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश से भी ऊपर स्थान दिया गया है। गुरु वह दिव्य प्रकाश है जो अज्ञान के अंधकार को मिटाकर ज्ञान की ज्योति प्रज्वलित करता है। “हे गुरुदेव प्रणाम आपके चरणों में” ऐसा ही एक मनमोहक भजन है जो गुरु के प्रति असीम श्रद्धा, भक्ति, प्रेम, कृतज्ञता और समर्पण की भावना को अभिव्यक्त करता है। यह भजन केवल एक गीत नहीं, बल्कि एक साधना, एक प्रार्थना, एक आत्म-निवेदन और एक आध्यात्मिक अनुभव है जो हृदय की गहराइयों को स्पर्श करता है। यह भजन जब गाया या सुना जाता है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो आत्मा स्वयं गुरु के चरणों में नतमस्तक हो रही हो। इसकी प्रत्येक पंक्ति में वह शक्ति है जो मनुष्य को विनम्र, शांत, भावुक, आत्म-चेतन और आध्यात्मिक रूप से जाग्रत बना देती है। भजन का भावार्थ और आध्यात्मिक महत्व भजन की शुरुआत ही प्रणाम से होती है: हे गुरुदेव प्रणाम, आपके चरणों में… यह प्रणाम केवल शारीरिक नमन नहीं, बल्कि अहंकार का पूर्ण विसर्जन है। गुरु के चरणों में प्रणाम का अर्थ है: अपनी बुद्धि, मन और आत्मा को गुरु के मार्गदर्शन में समर्पित कर देना। जीवन की हर उपलब्धि, हर सफलता और हर आशीर्वाद का श्रेय गुरु को देना। यह स्वीकार करना कि “मैं कुछ भी नहीं, जो भी हूँ, आपकी कृपा से हूँ।” गुरु के चरण आध्यात्मिकता में धैर्य, शांति, करुणा, धर्म, ज्ञान और मोक्ष का प्रतीक हैं। चरणों में नमन करना यह दर्शाता है कि शिष्य ज्ञान को सिर से नहीं, बल्कि विनम्रता के माध्यम से ग्रहण करता है। गुरु का स्वरूप — शास्त्रों की दृष्टि में 1. गुरु = ज्ञान का महासागर गुरु वह महासागर है जिसमें ज्ञान की अनंत धाराएँ समाहित हैं। शिष्य जब गुरु के समीप आता है, तो उसकी आत्मा ज्ञान की गहराइयों में उतरने लगती है। गुरु के बिना ज्ञान अधूरा है, ठीक वैसे ही जैसे सूरज के बिना सुबह नहीं। 2. गुरु = अज्ञान का विनाशक जिस प्रकार दीपक अंधकार को मिटा देता है, उसी प्रकार गुरु का ज्ञान अज्ञान को समाप्त कर देता है। यह भजन उसी अंधकार-विनाश की प्रार्थना है: आपकी कृपा से ज्ञान मिले, मन का अंधेरा दूर हो जाए… 3. गुरु = आत्मा का दर्पण गुरु शिष्य को वही दिखाता है जो वह स्वयं नहीं देख पाता। गुरु दोष नहीं बताता, सत्य दिखाता है। गुरु आलोचक नहीं, सुधारक है। वह निर्णय नहीं देता, दिशा देता है। 4. गुरु = मोक्ष का द्वार गुरु वह पुल है जो संसार से परमात्मा तक पहुँचाता है। गुरु बिना तीर्थ, व्रत, तप, साधना और मंत्र भी अधूरे हैं। इसलिए भजन में शिष्य कहता है: आपके बिना मैं खोया हूँ, राह दिखा दो गुरुदेव… भजन में छुपी मुख्य आध्यात्मिक शिक्षाएँ 1. विनम्रता भजन की आत्मा विनम्रता है। इसमें शिष्य अपने अहंकार को पूर्ण रूप से त्यागकर कहता है: मैं मूरख हूँ, अज्ञानी हूँ, तुझसे ही पहचान मेरी… 2. कृतज्ञता गुरु के प्रति कृतज्ञता भजन का मूल भाव है: जो दिया है आपने गुरुदेव, वह जन्मों का उपकार है… 3. विश्वास गुरु पर विश्वास ऐसा कि बिना प्रश्न किए, बिना शंका किए, बस समर्पण: तुम ही हो आधार मेरे, तुम ही जीवन-नाव के खेवनहार… 4. धर्म गुरु केवल आध्यात्मिक शिक्षक नहीं, बल्कि धर्म के संरक्षक भी हैं। भजन धर्म-पालन की प्रेरणा देता है: सत्य की राह पर चलना सिखा दो, सेवा धर्म निभाना सिखा दो… 5. सेवा गुरु-भक्ति का सबसे बड़ा रूप = सेवा। इसलिए भजन में निवेदन है: सेवा का अवसर दे दो गुरुदेव, यही साधना मेरी… भजन का संगीतात्मक सौंदर्य 1. मधुर धुन इस भजन की धुन अत्यंत सरल, शांत, धीमी, हृदयस्पर्शी और भावपूर्ण है। यह धुन मन को ध्यान की अवस्था में ले जाती है। इसे सुनते ही शांति की लहरें हृदय में उतरने लगती हैं। 2. ताल और लय भजन की लय “द्रुत नहीं, शांत और प्रवाहमयी” है। यह ऐसी लय है जिसे हर आयु वर्ग, हर भक्त और हर साधक आसानी से गा सकता है। 3. शब्दों की शक्ति भजन के शब्द सरल हिंदी और सहज भावों में हैं, लेकिन उनका प्रभाव गहरा है। जैसे: चरणों की धूल जो मिल जाए, तो जीवन पावन हो जाए… यह पंक्ति आध्यात्मिक जगत का सबसे बड़ा सत्य है कि “गुरु की कृपा सबसे बड़ा तीर्थ है।” गुरु-शिष्य परंपरा और यह भजन यह भजन गुरु-शिष्य परंपरा की याद दिलाता है जहाँ: गुरु ज्ञान देता है, शिष्य सेवा देता है। गुरु मार्ग देता है, शिष्य विश्वास देता है। गुरु प्रकाश देता है, शिष्य समर्पण देता है। प्राचीन काल में शिष्य गुरु के आश्रम में रहकर गुरु के कार्यों में सहयोग करता था, तभी ज्ञान ग्रहण करता था। यह भजन उसी परंपरा का आधुनिक स्वरूप है — जहाँ आश्रम भले न हो, लेकिन चरणों में नमन आज भी वही पवित्र भाव रखता है। गुरु की कृपा — भजन में व्यक्त अनुभव भजन में गुरु-कृपा का अनुभव बार-बार झलकता है: आपकी नज़र जहाँ पड़ जाए, भाग्य वहीं जग जाता है… यह पंक्ति यह बताती है कि गुरु की दृष्टि केवल देखती नहीं, जीवन बदल देती है। मेरी हर साँस में तेरा नाम, मेरी हर राह में तेरा धाम… गुरु शिष्य की चेतना में इस प्रकार बस जाता है कि वह बाहरी संसार से हटकर आंतरिक यात्रा पर निकल पड़ता है।