यह अध्याय "समकालीन दक्षिण एशिया"(Contemporary South Asia) पर केंद्रित है। यह शीत युद्ध के बाद के दौर में दक्षिण एशियाई क्षेत्र में हुए राजनीतिक और कूटनीतिक बदलावों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है। इस अध्याय के मुख्य बिंदुओं का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है: 1. दक्षिण एशिया का परिचय और भौगोलिक स्थिति: अध्याय की शुरुआत में दक्षिण एशिया को एक विशिष्ट भौगोलिक और राजनीतिक क्षेत्र के रूप में परिभाषित किया गया है, जिसमें मुख्य रूप से सात देश शामिल हैं: बांग्लादेश, भूटान, भारत, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका। उत्तर में हिमालय और दक्षिण, पश्चिम व पूर्व में समुद्र (हिंद महासागर, अरब सागर, बंगाल की खाड़ी) इसे एक अलग प्राकृतिक क्षेत्र बनाते हैं। चीन इस क्षेत्र का एक प्रमुख देश है, लेकिन उसे दक्षिण एशिया का अंग नहीं माना जाता है। 2. विभिन्न देशों की राजनीतिक प्रणालियाँ: यह अध्याय बताता है कि इस क्षेत्र के देशों में एक समान राजनीतिक प्रणाली नहीं है: भारत और श्रीलंका: आजादी के बाद से ही सफलतापूर्वक लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम रखने में सफल रहे हैं। पाकिस्तान और बांग्लादेश: यहाँ लोकतांत्रिक और सैनिक दोनों तरह का शासन रहा है। पाकिस्तान में सेना, धर्मगुरु और भूस्वामी अभिजनों का दबदबा लोकतंत्र के स्थाई न बन पाने का एक बड़ा कारण है। वहीं, बांग्लादेश 1971 में पाकिस्तान से अलग होकर एक स्वतंत्र राष्ट्र बना और संघर्षों के बाद अब वहाँ बहुदलीय लोकतंत्र स्थापित है। नेपाल: यह अतीत में एक हिंदू राज्य था और लंबे समय तक संवैधानिक राजतंत्र रहा। माओवादी विद्रोह और जन-आंदोलन के बाद 2008 में राजतंत्र खत्म हुआ और नेपाल एक लोकतांत्रिक गणराज्य बना। मालदीव: 1968 तक सल्तनत था, फिर गणतंत्र बना और 2005 के बाद से यहाँ बहुदलीय प्रणाली अपनाई गई। एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि इन देशों की जनता, चाहे वह धनी हो या नहीं, लोकतंत्र को तानाशाही से बेहतर मानती है और इसका समर्थन करती है। 3. क्षेत्र के प्रमुख संघर्ष और विवाद: अध्याय में दक्षिण एशिया को संघर्षों वाला क्षेत्र भी बताया गया है: भारत-पाकिस्तान संघर्ष: विभाजन के बाद से ही कश्मीर मुद्दे, सियाचिन ग्लेशियर और हथियारों की होड़ को लेकर दोनों देशों में तनाव और युद्ध (1947-48, 1965, 1971, 1999) हुए हैं। दोनों देशों के परमाणु शक्ति संपन्न होने के कारण यह क्षेत्र संवेदनशील है। श्रीलंका का जातीय संघर्ष: यहाँ बहुसंख्यक सिंहली और अल्पसंख्यक तमिलों (लिट्टे) के बीच हिंसक संघर्ष चला। भारत ने भी 1987 में शांति सेना भेजकर हस्तक्षेप किया था, जिसे बाद में वापस बुला लिया गया। अन्य विवाद: भारत के अपने पड़ोसियों के साथ कई मुद्दों पर मतभेद हैं, जैसे बांग्लादेश के साथ नदी जल बंटवारा और अवैध आप्रवास, तथा नेपाल के साथ व्यापार और चीन से दोस्ती को लेकर चिंताएँ। छोटे देशों को अक्सर लगता है कि भारत अपने आकार और ताकत का गलत फायदा उठाना चाहता है। 4. शांति और सहयोग के प्रयास: तमाम संघर्षों के बावजूद, यह अध्याय सहयोग की संभावनाओं पर भी प्रकाश डालता है। दक्षिण एशियाई देशों ने 'दक्षेस' (SAARC) का गठन किया है ताकि आपसी सहयोग बढ़ सके। इसके अलावा, 'साफ्टा' (SAFTA) जैसे समझौते किए गए हैं ताकि इस क्षेत्र में मुक्त व्यापार को बढ़ावा मिले और शांति स्थापित हो सके। 5. बाहरी शक्तियों की भूमिका: अध्याय के अंत में यह बताया गया है कि इस क्षेत्र की राजनीति में बाहरी ताकतें, विशेषकर चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। शीत युद्ध के बाद भारत और पाकिस्तान दोनों के साथ अमेरिका के संबंध बेहतर हुए हैं और इस क्षेत्र में उसका प्रभाव बढ़ा है। संक्षेप में, यह अध्याय दक्षिण एशिया को लोकतंत्र की आकांक्षाओं, जातीय संघर्षों, सीमा विवादों और सहयोग के प्रयासों के एक जटिल मिश्रण के रूप में प्रस्तुत करता है।