⚜️ महादेव वाली महामाया को पार करना कठिन है किंतु अष्टमूर्ति देवात्माएं इस बीजरूप माया को पार कर जाते हैं ⚜️ ⚜️ गीता अध्याय 7/12-13-14-15-16-17-18 ⚜️ ⚜️ गीता 7/12 ।। चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये ।। मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ।।12।। भावार्थ:- और भी जो संसार में युगानुरूप क्रमशः सात्विक राजसी और तामसी प्रकृतिगत अवसरगत ही भाव है उनको मेरे कैलाशी वासी महादेव से ही है ऐसा जान। मैं ब्रह्मलोक वासी सदाशिव उनमें व्यापी नहीं। किंतु वे मेरी मूर्ति महादेव है, काल क्रमानुसार है। ⚜️ गीता 7/13 ।। त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभि: सर्वमिदं जगत्ओ । मोहितं नाभिजानाति मामेभ्य: परमव्ययम् ।।13।। भावार्थ:- मानवों के पिता आदम के सत- रज- तम इन तीन गुणयुक्त भावों द्वारा अज्ञान सहित मोहित हुआ ये अधोमुखी सृष्टि का सारा संसार इन गुणों से परे मुझ अविनाशी तुरिया सदाशिव ज्योति के समान बने (मुझ साकार पार्टधारी) एक मुखी रुद्राक्ष को नहीं जानता। ⚜️ गीता 7/14 ।। दैवी ह्रोषा गुणमयी मम माया दुरत्यया । मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ।।14।। भावार्थ निश्चय ही यह देव असली में महरौली के मायापति बने। मेरे पति महादेव वाली त्रिगुणमयी महामाया को पार करना कठिन है । जो तन मन धन आदि सर्व रूप से मेरी शिव+बाबा की ही अव्यभिचारी शरण लेते हैं। वे अष्टमुर्ति देवात्माएँ इस बीजरूप माया को पार कर जाते हैं। "शंकर क्या करते हैं उनका पाठ ऐसा वंडरफुल है जो तुम विश्वास कर न सको।" (मु.ता.14-5-70) ⚜️ गीता 7/15 ।। न मां दुष्कृतिनो मूढा: प्रपद्यन्ते नराधमा: । माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिता: ।।15।। भावार्थ:- इस महामाया द्वारा जिनका ज्ञान हर लिया गया है। वे द्वैतवादी धनुपुत्र दैत्य आसुरी हिंसा के मनमाने भावों के आश्रित हुए भ्रष्ट इंद्रियों की भी हिंसा वाले दुष्कर्मी और ऐसे ही नर निर्मित नरक के नीच मूर्ख लोग मेरी शरण में सहज रीति नहीं आते। ⚜️ गीता 7/16 ।।चतुर्विधा भजन्ते मां जना: सुकृतिनोऽर्जुन । आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ।।16।। भावार्थ:- हे भरत विष्णुवंश में श्रेष्ठ अर्जुन द्वापर युग से चार प्रकार के पुण्य कर्मीशील पापालोग मुझ निराकार+साकार को भजते हैं। विपत्ति ग्रस्त कुछ जानने के इच्छुक धनार्थी और तीनों लोकों में सब कुछ जानने समझने के प्रयासी अर्थात ज्ञानी। ⚜️ गीता 7/17 ।। तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते । प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रिय: ।।17।। भावार्थ:- उन पूर्व जन्मकृत पुण्य कर्मौं के अभ्यासियों में एक हीरो पात्रधारी+शिव ज्योति की अव्यभिचारी याद वाला सदा योगी ज्ञानी त्रिनेत्रि महादेव आत्मा विशेष श्रेष्ठ है क्योंकि ज्ञानी को मैं शिव ज्योति प्रिय हूं और वह मेरा अटूट ज्ञान वारिस मुझको सदा अति प्रिय है। बाबा कहते "ज्ञानी तू एक आत्मा ही मुझे सदाशिव को अति प्रिय है। ऐसे नहीं कि योगी प्रिय नहीं है। जो जितना ज्ञानी होगा वह उतना योगी भी जरूर होगा।" ( मु. ता. 4-12-88 पृष्ठ दो मध्य) ।।ज्ञानी प्रभू ही विशेष प्यारा।। तुलसीदास रामायण जैसे:-।।ज्ञानिनामग्रगण्यम् ।। हनुमान ही विशेष प्रिय कहा गया है। ⚜️ गीता 7/18 ।। उदारा: सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् । आस्थित: स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ।।18।। भावार्थ:- यों तो ये चारों ही उत्कृष्ट हैं। किंतु संपूर्ण ज्ञानी तो जैसे मेरी अपनी आत्मा ही है। ये मेरा मत है। क्योंकि वह योगी आत्मा मुझ सदाशिव ज्योति की परम ब्रह्मलोकीय सर्वोत्तम गति में ही आधारित है इसीलिए संपूर्ण संगठित चतुर्भुज ब्रह्मा को 1000 भुजाएं दिखाते हैं। और याद के पुरुषार्थी शंकर को इतनी और ऐसी भुजाएँ नहीं दिखाते। ।। जिनके कछु और आधार नहीं तिनके तुम ही रखवारे हो।। (तुलसीदास रामायण) और तो सभी सीताएँ है। जो अपरा प्रकृति+माया के आधीन हो जाती हैं इसलिए यादगार में आज गांवों में गाते हैं:- ।। राजा एक राम भिखारी सारी दुनिया।। 🙏🙏