गुरु—यह शब्द मात्र दो अक्षरों का है, परंतु इसका अर्थ अनंत आकाश जितना विस्तृत है। ‘गु’ का अर्थ है अंधकार और ‘रु’ का अर्थ है उसे दूर करने वाला प्रकाश। जो अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश दे, वही गुरु है। गुरु हमारे जीवन के वह आधार स्तंभ हैं, जिनके बिना जीवन की इमारत न तो स्थिर रह सकती है और न ही सुंदर। भारतीय संस्कृति में गुरु को ईश्वर से भी ऊँचा स्थान दिया गया है—“गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः।” अर्थात गुरु ही सृष्टि के रचयिता, पालनकर्ता और संहारकर्ता—तीनों का स्वरूप हैं। गुरु वह नाव हैं, जो भवसागर से पार उतारती हैं। गुरु वह वृक्ष हैं, जो स्वयं धूप सहकर शिष्य को छाँव देते हैं। गुरु वह आकाश हैं, जिनमें शिष्य का जीवन पक्षी बनकर स्वतंत्र उड़ान भरता है। इसी गुरु-भक्ति की अमर भावना को समर्पित एक अत्यंत मधुर, दिव्य और हृदयस्पर्शी भजन है—“Hey Gurudev Pranam, हे गुरुदेव प्रणाम आपके चरणों में।” यह भजन मात्र गीत नहीं, बल्कि गुरु के प्रति समर्पण, श्रद्धा, प्रेम, विनय, कृतज्ञता और आत्म-समर्पण की गूँज है। जब कोई शिष्य अपने गुरु के चरणों में नतमस्तक होकर कहता है—“हे गुरुदेव, प्रणाम आपके चरणों में,” तो यह केवल अभिवादन नहीं, बल्कि उसके पूरे अस्तित्व का समर्पण है। यह भजन उस भाव को शब्द देता है, जो हृदय की गहराइयों में मौन रूप से बसता है। भजन की पहली पंक्ति ही शिष्य की विनम्रता, गुरु के प्रति असीम श्रद्धा और उसके जीवन में गुरु की सर्वोच्च उपस्थिति को प्रकट कर देती है। यह भजन हर उस व्यक्ति के हृदय में उतरता है, जिसने अपने जीवन में गुरु का मार्गदर्शन पाया है—चाहे वह आध्यात्मिक गुरु हों, संगीत गुरु हों, शिक्षा गुरु हों या जीवन-गुरु के रूप में मिले कोई मार्गदर्शक हों। भजन का सार यही है कि गुरु के बिना जीवन अधूरा है, गुरु के बिना दिशा नहीं, गुरु के बिना ज्ञान नहीं, गुरु के बिना आत्मबोध नहीं, और गुरु के बिना मुक्ति की राह भी नहीं। यह भजन शिष्य की उस आत्मिक पुकार को प्रकट करता है, जिसमें वह गुरु से केवल ज्ञान नहीं, बल्कि कृपा, संरक्षण, मार्गदर्शन, प्रेम और जीवन का संपूर्ण आलोक चाहता है। भजन का भाव-पक्ष 1. प्रणाम—समर्पण की मुद्रा भजन में ‘प्रणाम’ शब्द बार-बार आता है, क्योंकि प्रणाम केवल सिर झुकाने की क्रिया नहीं, बल्कि अहंकार झुकाने की साधना है। गुरु को प्रणाम का अर्थ है—मैं नहीं, आप हैं। मेरा ज्ञान सीमित है, आपकी ज्योति असीम है। मेरा अस्तित्व तुच्छ है, आपकी उपस्थिति विराट है। प्रणाम में विनय है, और विनय में ज्ञान प्राप्ति का द्वार। 2. चरणों में—सर्वस्व समर्पण का स्थान भारतीय परंपरा में चरण स्पर्श का अर्थ है—गुरु की ऊर्जा, आशीष, कृपा और संस्कारों का स्पर्श ग्रहण करना। गुरु के चरण वह तीर्थ हैं, जहाँ शिष्य का अहं विसर्जित होता है और आत्मा शुद्ध होती है। जब शिष्य कहता है—“आपके चरणों में,” तो इसका अर्थ है—मैं अपना तन, मन, बुद्धि, कर्म और जीवन—सब आपके श्रीचरणों में अर्पित करता हूँ। 3. कृपा—ज्ञान से भी ऊपर का तत्व भजन में गुरु की कृपा की याचना प्रमुख रूप से की गई है, क्योंकि ज्ञान पुस्तक से भी मिल सकता है, परंतु कृपा केवल गुरु से मिलती है। ज्ञान मार्ग दिखाता है, कृपा मार्ग पर चलने की शक्ति देती है। ज्ञान दिशा देता है, कृपा सुरक्षा देती है। ज्ञान तर्क देता है, कृपा विश्वास देती है। ज्ञान बोध देता है, कृपा आनंद देती है। 4. भवसागर से पार—गुरु ही नाविक भजन में गुरु को भवसागर से पार उतारने वाला बताया गया है। यह संसार रूपी समुद्र अनंत लहरों, भ्रमों, विकारों, मोह-माया और दुखों से भरा है। गुरु वह नाविक हैं, जो इन लहरों के बीच भी नाव को स्थिर रखते हैं और शिष्य को सुरक्षित किनारे तक ले जाते हैं। 5. जीवन में प्रकाश—गुरु की ज्योति भजन में गुरु को प्रकाश का स्रोत कहा गया है। शिष्य मानता है कि उसके भीतर जो भी उजाला है, वह गुरु की ज्योति का प्रतिफल है। जैसे चंद्रमा का प्रकाश सूर्य से उधार लिया हुआ है, वैसे ही शिष्य का ज्ञान गुरु से प्राप्त आलोक का प्रतिबिंब है। भजन का विस्तृत आध्यात्मिक अर्थ यह भजन हमें पाँच प्रमुख आध्यात्मिक शिक्षाएँ देता है: 1. गुरु का स्थान सर्वोच्च है। ईश्वर तक पहुँचने की सीढ़ी भी गुरु हैं। मंदिर तक पहुँचने का मार्ग भी गुरु हैं। मंत्र तक पहुँचने का अर्थ भी गुरु हैं। स्वयं तक पहुँचने की साधना भी गुरु हैं। 2. शिष्य का पहला गुण विनय है। जो झुकना सीख गया, वह उठना भी सीख गया। जिसने अहं छोड़ा, उसने ज्ञान पाया। जिसने ज्ञान पाया, उसने आनंद पाया। 3. गुरु की कृपा जीवन का मूल धन है। बिना कृपा ज्ञान भी बोझ है, और कृपा के साथ मौन भी शास्त्र है। 4. गुरु के प्रति कृतज्ञता ही मुक्ति का द्वार है। कृतज्ञता में अहं का अंत है, और अहं के अंत में आत्मा का आरंभ। 5. गुरु की सेवा ही साधना है। दीपक की सेवा बाती है, गुरु की सेवा शिष्य है। सेवा में प्रेम है, प्रेम में समर्पण, समर्पण में शांति, शांति में आनंद, आनंद में मुक्ति। भजन की भाव-अनुभूति का विस्तार जब यह भजन गाया जाता है, तो यह हृदय में कुछ विशिष्ट अनुभूतियाँ जगाता है: • आँखों में नमी —गुरु के उपकार का स्मरण • हृदय में भारहीनता —अहं का झुकना • मन में शांति —गुरु-स्मरण की छाँव • अंतःकरण में प्रेम —गुरु के प्रति अनकहा अपनापन • आत्मा में हलचल —सत्य की पुकार • चेतना में स्थिरता —गुरु की उपस्थिति का बोध • जीवन में प्रेरणा —गुरु जैसा बनने की चाह भजन का सांस्कृतिक महत्व आज के समय में जब जीवन भागदौड़, तनाव, प्रतिस्पर्धा, भ्रम और मानसिक अशांति से भरा है, यह भजन हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का संदेश देता है। यह याद दिलाता है कि जीवन में कोई ऐसा केंद्र होना चाहिए, जहाँ हम झुक सकें, विश्वास रख सकें, मार्ग पा सकें और सुरक्षित अनुभव कर सकें। वही केंद्र गुरु हैं।